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कहर:करेह व कोसी नदी का जलस्तर बढ़ा सिरसिया गांव में बाढ़ का पानी घुसा

समस्तीपुर22 दिन पहले
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हसनपुर के सिरसिया गांव के खेतों में फैला बाढ़ का पानी। - Dainik Bhaskar
हसनपुर के सिरसिया गांव के खेतों में फैला बाढ़ का पानी।
  • बढ़ते जल स्तर से लगातार बढ़ रही बाढ़ पीड़ितों की समस्या, प्रशासन से मदद नहीं

पिछले डेढ़ महीने से करेह एवं कोसी नदी के जलस्तर में उतार-चढ़ाव के बीच दोनों नदियों के जलस्तर में फिर से तेजी से बढ़ोतरी हुई है। जलस्तर में बढ़ोतरी होने से सिरसिया के दूसरे हिस्से में भी बाढ़ का पानी प्रवेश कर गया है। गांव के बाहर चारों तरफ के खेतों में बाढ़ का पानी फैल गया है। इस कारण खेतों में लगे धान के फसल पानी में डूब चुके हैं। इससे फसल के नष्ट होने का डर बन गया है। गांव के किसानों के करीब 50 एकड़ खेतिहर भूमि में लगे धान की फसल पानी में डूब चुके हैं।

अचानक फिर से हुई जलस्तर में बढ़ोतरी से बाढ़ पीड़ितों के साथ ही मवेशियों की परेशानी बढ़ गई है। गांव के चारों तरफ बाढ़ के पानी फैले होने व सड़कों पर पानी बहने से लोगों का गांव से बाहर निकलना मुश्किल हो गया है। गांव से बाहर निकलने का एक मात्र साधन अब नाव ही है। नाव के सहारे गांव के लोग घर छोड़कर उंचे स्थलों पर शरण लेने के लिए पलायन कर रहे हैं। मवेशियों व मनुष्यों के लिए भोजन एवं रहन सहन की समस्या उत्पन्न हो गई है। मवेशी सूखा भूसा खाकर व मनुष्य सत्तू खाकर जीवन यापन करने को विवश हैं।
एक हिस्सा करेह नदी तो दूसरा कोसी की पेटी में है बसा हुआ
भटवन पंचायत की सिरसिया गांव जिसकी आबादी 6 हजार के करीब है। यह गांव दो अलग-अलग हिस्से में बंटा हुआ है। एक हिस्सा करेह नदी की पेटी में बसा हुआ है। तो दूसरा हिस्सा कोसी नदी की पेटी में बसा हुआ है। ऐसे तो पिछले डेढ़ महीने में दोनोa नदियों के जलस्तर में बढ़ोतरी हो रही है। इनमें करेह नदी के जलस्तर में बढ़ोतरी होने से सिरसिया का एक हिस्सा पिछले 15 दिनों से पूरी तरह बाढ़ से प्रभावित है ही। कोसी नदी के जलस्तर में बढ़ोतरी होने से गांव का दूसरा हिस्सा भी अब बाढ़ की चपेट में आ गया है।

किसानों ने बताई अपनी समस्या
सिरसिया गांव के किसानों में मोहम्मद डब्ल्यू, मोहम्मद अखलाक, मोहम्मद मुन्ना आदि ने बताया कि वे लोग अपने-अपने खेतों में काफी आशा के साथ धान की फसल लगाए थे। लेकिन बाढ़ की विभीषिका ने आशा के किरण पर पानी फेर दिया। किसानों ने बताया कि वे लोग कर्ज के रुपए से खेती किए थे। पर अब फसल नष्ट होने के बाद आर्थिक आमदनी तो दूर कर्ज टूटना भी मुश्किल हो गया है।

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