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नवरात्र:मां काली शक्तिपीठ भेरोखरा में श्रद्धा के साथ हुई देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना

ताजपुर12 दिन पहले
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आस्था एवं विश्वास का केंद्र भेरोखरा स्थित मां काली शक्तिपीठ।
  • वीरान जंगल एवं श्मशान के बीच आज माता का भव्य मंदिर है जो दूर से ही दिखने लगता है

प्रखंड क्षेत्र के भेरोखरा पंचायत के वार्ड संख्या 3 स्थित बुढ़िया काली मंदिर के रूप में प्रचलित मां काली शक्ति पीठ में रविवार को नवरात्र के दूसरे दिन श्रद्धा व उल्लास के साथ मां ब्रह्मचारिणी की पूजा अर्चना की गई। पिछले कई वर्षों से आस्था एवं विश्वास का केंद्र मां काली शक्ति पीठ में श्रद्धालुओं की हर मन्नतें पूरी होती है। यहां मां काली भक्तों के हर संकट को दूर करती है। सैकड़ों वर्षों से आस्था का केंद्र बना हुआ है। कहा जाता है कि माता साक्षात यहां पिंडी के रूप में निवास करती है।

वीरान जंगल एवं श्मशान के बीच आज यहां माता का भव्य मंदिर है जो दूर से ही दिखने लगता है। हालांकि मंदिर का निर्माण कब हुआ, इसको लेकर लोगों में असमंजस बना रहता है। स्थानीय लोगों ने बताया कि पूर्वज भी मंदिर की चर्चा करते थे लेकिन उन्हें भी पता नहीं था कि मंदिर का निर्माण कब हुआ है। स्थानीय लोगों ने बताया कि हमारे पूर्वज कहते थे कि गांव में एक बार महामारी फैल गई थी। इससे गांव में चारों ओर कोहराम मचा हुआ था। असमय लोगों की मृत्यु होने से लोग निराश रहते थे।

इसी बीच एक साधु गांव से गुजर रहे थे। लोगों की परेशानी देखकर परेशानी का कारण पूछा। कारण जानने के बाद साधु गांव के लोगों को मां काली सहित सातों बहन का पिंडी स्वरुप निर्माण कर नियमित पूजने की सलाह दी। साथ ही गर्भगृह के बाहर दो जोगनी की स्थापना की गई थी। तब से आज तक उस स्थान पर पिंडी स्वरुप मां काली की पूजा होती आ रही है। यहां बलि चढ़ाने की पुरानी परंपरा है। महाअष्टमी को विधि विधान के साथ छाग की बलि चढ़ाई जाती है।

गर्भगृह पर भव्य मंदिर का हुआ निर्माण

मंदिर परिसर में अति प्राचीन पीपल का वृक्ष है, जिसे श्रद्धालु ब्रह्म बाबा के रूप में पूजा करते हैं। लोगों का मानना है कि मंदिर निर्माण के समय ही पीपल का वृक्ष लगाया गया था। प्राचीन समय में मंदिर झोपड़ी का था। मंदिर के ऊपर पीपल का विशाल टहनियां झुकी रहती थी। कई बार टहनी टूटकर मंदिर पर गिरा भी लेकिन मंदिर एवं गर्भगृह का कोई नुकसान नहीं हुआ। लोगों की आस्था एवं विश्वास बढ़ता गया। कहा जाता है कि सच्चे मन से मां के दरबार में जो भी आता है, मां उसकी हर मुरादें पूरी करती है।

आज उन्हीं स्थानीय लोगों द्वारा पिंडी स्वरुप माता की प्रेरणा से उसी गर्भगृह पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया है। यहां शारदीय और बासंतिक नवरात्रा के अवसर पर कलश स्थापना कर पूजा-पाठ, हवन एवं कुंवारी कन्याओं को भोजन एवं दक्षिणा दी जाती है। माता की पूजा-अर्चना करने वाले भक्तों को सुख, शांति, समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसके कारण यहां नवरात्र के अवसर पर श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है।

लगमा दुर्गा मंदिर: 44 साल से मिथिला पद्धति से होती है मां दुर्गा की आराधना

प्रखंड के लगमा गांव के करेह नदी के तट पर अवस्थित दुर्गा मंदिर वर्षों से क्षेत्र के लोगों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। बताया जाता है कि इस मंदिर में माथा टेकने वाले श्रद्धालुओं की मांगी गई मुरदे अवश्य पूर्ण होती है। शारदीय नवरात्रा के दौरान मंदिर में मिथिला पद्धति के अनुसार आचार्यों की देख रेख में ग्रामीणों के सहयोग से विधि पूर्वक 44 वर्षो से आराधना होतो आ रही है।

इस मंदिर की व्यवस्था को लेकर लगमा वासी अपना तन, मन व धन से तत्पर रहते है। बताया जाता है की इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1976 में हुई थी। ग्रामीणों द्वारा परिसर में भव्य मंदिर का निर्माण कराई गई। और नवरात्रा के दौरान मंदिर में मां दुर्गा की प्रतिमा बनाकर पूजा की आरंभ की गई थी। ग्रामीणों के अनुसार शुरुआत के दौरान मंदिर में सामान्य रूप से पूजा होती थी। लेकिन दिन प्रतिदिन माता की आस्था दूर दराज के क्षेत्रों में फैलते ही यहां माता के दरबार पहुंचने लगे।

नवरात्रा के अलावे यहां अन्य दिनों भी उत्सवी माहौल व्याप्त रहता है। ग्रामीणों के अलावे दूर दराज गांवों के लोग मुरादें मांगने माता के दरबार पहुंचते है। मंदिर में बलि देने की परंपरा है। श्रद्धालुओं की मांगी गई मनोकामना पूरी होने पर अष्टमी के दिन यहां सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु बकरे की बलि देने यहां पहुंचते है। आयोजक कमेटी के अनुसार इस बार रावण दहन व सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन नहीं किया जाएगा। पूजा के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग के बनाए रखने के लिए परिसर में ग्रामीण युवक तैनात रहेंगे।

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