महिला दिवस विशेष:जिले की कई महिलाएं अलग-अलग क्षेत्र में महिला सशक्तीकरण की बन चुकी है मिसाल

सीतामढ़ी9 महीने पहले
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  • महिलाओं के अधिकार, मान-सम्मान व उन्हें सशक्त बनाने की दिशा में कर रही हैं काम

जिले की महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही है। धीरे-धीरे ही सही, लेकिन महिलाओं में आत्मनिर्भरता बढ़ रही है। महिलाओं काे प्रोत्साहित करने के लिए ही आज के दिन को महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन को मनाने के पीछे सबसे बड़ी वजह है कि महिलाओं को शिक्षा में बढ़ावा, करियर के क्षेत्र में कई अवसर और पुरुषों के जैसे ही समान अधिकार मिल सकें।

इस विशेष अंक के जरिए हम अपको जिले के वैसी महिलाओं से अवगत करा रहे हैं, जो पुरुष प्रधान समाज की बेरियों को तोड़कर जिला, प्रदेश समेत देश स्तर पर ख्याति प्राप्त की हैं। वहीं, विभिन्न कार्यों के जरिये महिला सशक्तिकरण की दिशा में मुख्य भूमिका निभा रही हैं।

आचार बनाने तक महिलाएं सीमित नहीं
महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए सोनबरसा प्रखंड के सिंहवाहनी पंचायत में महिलाओं के लिए ब्यूटी पार्लर प्रशिक्षण, सिलाई सेंटर, वर्मी कंपोस्ट तैयार करना, फैशन डिजाईनिंग, कंस्ट्रक्शन वर्क समेत दस ट्रेड चलाया जा रहा है। अब तक करीब 400 महिलाओं को प्रशिक्षित किया जा चुका है। महिला सिर्फ आचार बनाने तक सीमित नहीं है। उन्हें अगर प्रशिक्षित किया जाए, ताे वें किसी भी क्षेत्र में पुरुष के मुकाबले बेहतर करने की क्षमता रखती है। -रितु जयवसाल, मुखिया, सिंहवाहनी पंचायत

ग्रामीण महिलाओं को शिक्षित कर दे रही अहम योगदान

समाज मे व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ अभियान चलाकर समृद्ध, बेहतर एंव विकसित समाज का निर्माण करने में जुटी है। निरक्षर को साक्षर बनाने के लिए अक्सर महिलाओं को पढ़ाती है। सप्ताह में एक या दो बार स्कूलों में जाकर क्लास भी लेती है। इनका मानना है कि छात्रों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ नैतिकता और संस्कार का पाठ पढ़ाना भी जरूरी है। इन्हीं विशेषताओं ने बिहार में ही नहीं देश मे अलग पहचान दी है। वर्ष 2005 में जिला परिषद सदस्य के रूप मे शुरू हुई राजनीतिक सफर प्रदेश राजनीति में अपनी एक अलग पहचान बना चुकी है। कुशल नेतृत्व क्षमता को जदयू पार्टी ने गंभीरता से लिया। यही कारण है कि उन्हें जदयू पार्टी ने समाज सुधार वाहिनी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। - डॉ. रंजू गीता, पूर्व विधायक, बाजपट्टी

नि:शक्त बच्चों में जगा रही शिक्षा की अलख
जिला मुख्यालय डुमरा के कैलाशपुरी वार्ड 10 में एक छोटे से मकान में करीब 23 वर्षों से सर्वोदय विकलांग विद्यालय के माध्यम से नि:शक्त बच्चों के बीच शिक्षा की अलख जगाकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा कर रही है। इनके प्रयास से अब तक 22 नि:शक्त युवक सरकारी सेवा में अपना योगदान दे रहे है। जबकि दर्जनों नि:शक्त गैर सरकारी सेवाओं में बेहतर प्रदर्शन कर रहे है। रोड पर भीख मांगने वाले नि:शक्त बच्चों को गोद लेकर ममता की छांव देती है। उन्हें शिक्षा देकर बेहतर जिंदगी के लिए प्रोत्साहित करती है। इनका हृदय इतना बड़ा है कि आज तक इन्होंने अपनी मेहनत का कोई शुल्क नहीं लिया। - प्रभावती झा, नि:शक्त बच्चों की शिक्षा के लिए प्रयासरत।

आज की महिला निर्भर नहीं, आत्मनिर्भर है
आज की महिला निर्भर नहीं है। वह हर मामले में आत्मनिर्भर, स्वतंत्र और पुरुषों के बराबर सब कुछ करने में सक्षम भी है। हमें महिलाओं का सम्मान जेंडर के कारण नहीं, बल्कि स्वयं की पहचान के लिए करना होगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि घर और समाज की बेहतरी के लिए पुरुष और महिला दोनों समान रूप से योगदान करते है। हर महिला बच्चों की परवरिश और घर संवारने में प्रमुख भूमिका निभाती है। यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम उस महिला की सराहना करें और उसका सम्मान करें, जो अपने जीवन में सफलता हासिल कर रही है। वहीं, महिलाओं और अपने आस-पास के लोगों को प्रोत्साहित कर रही है। - गायत्री देवी, विधायक, परिहार।

ख्याति प्राप्त लेखिका बनीं, 116 दिव्यांगों को कृत्रिम अंग दिलवाया
शादी के समय महज मैट्रिक तक पढ़ी-लिखी महिला एक दिन साहित्य की दुनिया में बड़ी सेलिब्रेटी बनकर उभरेंगी, किसे पता था। लेकिन, शिक्षा के प्रति जुनून ने सफलता दिलाई और आज देश-दुनिया में हिंदी व उर्दू साहित्य की दुनिया में चमकता सितारा हैं। लायंस क्लब की सदस्य हैं और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई व अन्य जरूरतों के लिए क्लब की ओर से मदद करती है। गरीब लड़कियों की शादी में मदद करती है और उनके बीच प्रतियोगिता करा उनकी प्रतिभाओं को उभारने के लिए मंच प्रदान करती है। गांवों में हेल्थ कैंप लगाकर मरीजों के बीच दवा भी बांटती है। महिला अधिकार के प्रति जागरूक करने के लिए कार्यक्रम भी चलाती है। इन्होंने 116 दिव्यांगो को कृत्रिम अंग दिलवाया है। - आशा प्रभात, साहित्यकार।

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