सीतामढ़ी के कण-कण में बसी है सीता, राेम-रोम में राम:हल के सीत से निकली बच्ची सीता के नाम पर शहर का नाम रखा गया सीतामढ़ी

सीतामढ़ी2 महीने पहले
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सी तामढ़ी शहर जगत जननी मां सीता के नाम से प्रख्यात है। सीतामढ़ी का मूल नाम सीतामही है। इसके पीछे पौराणिक कथा समाहित है। धार्मिक ग्रंथ रामायण में भी मां सीता के प्राकट्य होने की कथा वर्णित है। शहर से होकर लखनदेई नदी बह रही है। जिले के पश्चिम भाग में बागमती तो पूर्वी भाग में रातो व अधवारा समूह की नदियां जिले के भौगोलिक वातावरण को दर्शा रही हैं। कहा जाता है कि जब मिथिलांचल में अकाल पड़ा था तो राजा जनक को बड़ी चिंता हुई। ऋषि-मुनियों के साथ विचार-विमर्श कर रहे थे। तभी आकाशवाणी हुई कि राजा स्वयं हल चलाएं तो बारिश होगी। राजा जनक ने हलेष्ठि यज्ञ किया और स्वयं हल चलाना शुरू किया। इसी बीच हल के सीत से एक घड़ा टकराया। जिससे घड़ा टूट गया और उससे एक बच्ची निकली।

तभी मेघ गर्जन के साथ मूसलाधार बारिश होने लगी। दूर-दूर कर बारिश से बचने की जगह नहीं दिखी। पास ही में ऋषि पुण्डरीक की एक मड़ई दिखाई पड़ी। राजा उसी मड़ई में बच्ची को लेकर शरण लिए। हल के सीत से बच्ची के प्रकट होने के कारण नाम सीता रखा गया। तभी से इस जगह का नाम सीतामही पड़ा। कालांतर मंे अब यह शहर सीतामढ़ी के नाम से जाना जाता है। यहां दो जानकी मंदिर हैं, जो पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। इसके अलावा यहां रामायण काल से जुड़े कई दर्शनीय स्थल हैं।

सीतामढ़ी दर्शन की झलकियां

पुनौरा धाम

सीतामढ़ी रेलवे स्टेशन से चार किलोमीटर पश्चिम पुनौरा धाम भव्य जानकी मंदिर है। प्राचीन काल में यहां पुण्डरीक ऋषि का आश्रम हुअा करता था। बताया जाता है कि यहीं वह पुण्डरीक ऋषि का आश्रम था जहां बारिश से बचने के लिए राजा जनक अपनी बच्ची सीता को लेकर आए थे। मंदिर में मां सीता के साथ उनकी बहनों की प्रतिमा स्थापित है। यहां एक पर्यटन भवन, गायत्री मंदिर, विवाह मंडप, सुन्दर पार्क तथा म्यूजिकल फाउंटेन एवं फव्वारा है। ऋषि-मुनियाें द्वारा प्रवचन को लेकर विशाल प्रेक्षा गृह स्थापित है। पुनौरा धाम पिकनिक स्पॉट के रूप में भी जाना जाता है। यहां सालभर पर्यटक आते हंै। सरकार की ओर से हर साल दो दिवसीय सीतामढ़ी महोत्सव का आयोजन भी किया जाता है।

पंथपाकड़ धाम

जिला मुख्यालय से 8 किलोमीटर दूर बथनाहा में है पंथपाकड़ धाम। इसकी चर्चा रामायण में है। मान्यता है कि त्रेता युग में जब भगवान राम का सीता से विवाह हुआ तो मां जानकी की डोली जनकपुर से अयोध्या के लिए निकली। उस डोली का पहला पड़ाव यहीं पर हुआ था। बताया जाता है कि मां सीता ने अहले सुबह पाकड़ पेड़ की डाली को तोड़ कर दातून की अौर दातून का चीरा पास में ही फेंक दिया गया। उससे यहां जगह-जगह पाकड़ का पेड़ उग आया। बताया गया है कि वाल्मीकि रामायण में वर्णित राम-परशुराम का संवाद भी यहीं हुआ था। पाकड़ के पेड़ों की दो दर्जन से अधिक शाखाएं हैं और इस परिसर में एक प्राचीनतम कुंड भी है। आज यह पंथपाकड़ पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

जानकी स्थान

सीतामढ़ी शहर में जानकी स्थान मंदिर का निर्माण वर्षों पूर्व किया गया था। सैकड़ों वर्ष पुराने इस भव्य मंदिर का मुख्य द्वार चांदी से बना हुआ है। यहां बहुमूल्य काले पत्थर से निर्मित मां सीता और भगवान श्री राम की अद्भुत प्रतिमा भक्तों का ध्यान आकर्षित करती है। मंदिर परिसर में उर्विजा कुण्ड भव्य और आकर्षक है। कुंड के बीचोबीच राजा जनक द्वारा हल चलाते एवं घड़े से प्रकट हो रही मां सीता की प्रतिमा पर्यटकों को आकर्षित करती है।
हलेश्वर स्थान

सीतामढ़ी शहर से 5 किमी दूर फतेहपुर गिरमिसानी गांव में हलेश्वर स्थान है। यहां पर राजा जनक द्वारा शिवलिंग स्थापित किया गया था। कहते हंै कि राजा जनक ने राज्य में पड़े अकाल से प्रजा को मुक्ति दिलाने के लिए यहीं पर हलेष्ठि यज्ञ शुरू किया था। राजा जनक द्वारा यज्ञ शुरू करने से पहले शिवलिंग की स्थापना की थी। इसलिए इस स्थान का नाम हलेश्वरनाथ मंदिर रखा गया। यहां पर भी पर्यटक दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं।

सीतामढ़ी में मां सीता से जुड़े धार्मिक स्थल

मढिया धाम | जिला मुख्यालय डुमरा से 32 किलोमीटर उत्तर भारत-नेपाल सीमा पर सोनबरसा प्रखंड में अवस्थित है मढिया धाम। यहां प्राचीन शिवलिंग स्थापित है। प्रत्येक रविवार को जलाभिषेक के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगती है। खासकर श्रावण माह में यहां नेपाल और भारत के श्रद्धालु जुटते हैं।
श्री माता वैष्णो देवी मंदिर | सीतामढ़ी शहर में स्थापित है भव्य और सुंदर श्री माता वैष्णो देवी मंदिर। यहां भव्य और आकर्षक प्रतिमा स्थापित की गई है। यहां पर भी श्रद्धालुओं की भारी भीड़ लगी रहती है। विशेष कर नवरात्र में दुर्गापूजा के समय माता के दरबार को और भी भव्य और सुंदर ढंग से सजाया जाता है ।
श्री शुकेश्वर नाथ मंदिर | जिला मुख्यालय डुमरा से करीब 30 किलोमीटर देर मेजरगंज प्रखंड के बसबिट्टा में स्थापित है श्रीशुकेश्वरनाथ मंदिर। मान्यता है कि व्यास पुत्र शुकदेव ने यहीं बागमती नदी के किनारे भगवान शंकर की पूजा-अर्चना की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे। यहां श्रद्धालुओं की काफी भीड़ लगी रहती है। श्रावण मास में यहां पर पड़ोसी देश नेपाल से भी काफी संख्या में श्रद्धालु आते हैं ।
बाजपट्‌टी का बोधायन मंदिर | बाजपट्टी प्रखंड में महर्षि बोधायन की प्रतिमा स्थापित है। यहां एक प्राचीन तालाब बौधायनसर है। कहा जाता है कि संस्कृत व्याकरण के ज्ञाता पाणिनि के गुरु बोधायन ने यहां कई काव्यों की रचना की थी। इस तालाब के किनारे हर्षकालीन महर्षि बोधायन की प्रतिमा स्थापित है। इसे पर्यटन से जोड़ने को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश ने भी पहल शुरू कर दी है।

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