नालंदा के कपिलदेव प्रसाद को पद्मश्री सम्मान:टेक्सटाइल के क्षेत्र में मिला अवार्ड, 60 वर्षों से हस्तकरघा के जरिए बनाते रहे बावन बूटी साड़ी

नालंदा14 दिन पहले
कपिलदेव प्रसाद।

74 वें गणतंत्र दिवस के पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति द्वारा देश के सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री की घोषणा की गयी। इसमें देशभर के कई हस्तियों के नाम शामिल हैं। उन्हीं नामों में एक नाम नालंदा से भी जुड़ा है। कपिलदेव प्रसाद पद्मश्री पुरस्कार पाने वाले नालंदा के पहले शख्स हैं।

26 जनवरी के पहले गुमनामी की जिंदगी जी रहे कपिलदेव प्रसाद अचानक चर्चा में आ गए। लगभग 70 साल की उम्र में टेक्सटाइल के क्षेत्र में उन्हें पद्मश्री सम्मान देने की घोषणा की गयी है।

पद्मश्री सम्मान के घोषणा के बाद कपिलदेव प्रसाद ने कहा कि यह सम्मान पाकर वह काफी अभिभूत हूं। यह सम्मान सिर्फ उनका नहीं बल्कि हर उन लोगों का है जो हस्तकरघा से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि इस सम्मान के साथ नालंदा की पहचान जुड़ी है।

दादा भी हस्तकरघा के जरिए बावन बूटी साड़ी बनाते थे

कपिलदेव प्रसाद का जन्म 1954 में हुआ था। उनकी खानदानी पेशा रही है हस्तकरघा। वे बताते हैं कि उनके दादा भी हस्तकरघा के जरिए बावन बूटी साड़ी बनाते थे और बाद में पिता ने भी यही धंधा अपनाया था। पिछले लगभग 60 वर्षों से वे लगातार हस्तकरघा से जुड़े रहे और अब इस कार्य में उनका एकलौता पुत्र भी हस्तकरघा के कार्यों में हाथ बंटाते है।

नालंदा जिला मुख्यालय बिहारशरीफ से तीन किलोमीटर पूरब उत्तर स्थित एक छोटा सा टोला जिसका नाम है बासवन बिगहा। इसी गांव से आते हैं कपिलदेव प्रसाद। जिन्होंने बावन बूटी साड़ी के लिए जीआई टैग प्राप्त करने हेतु आवेदन भी दिया है। वे कहते हैं कि बावन बूटी साड़ी के जीआई टैगिंग मिलने से इसकी पहचान नालंदा से जुड़ेगी।

कपिलदेव प्रसाद की फाइल फोटो।
कपिलदेव प्रसाद की फाइल फोटो।

बावन बूटी साड़ी का इतिहास बौद्ध काल से जुड़ा

बताते चलें कि हस्तकला की बावन बूटी साड़ी का इतिहास बौद्ध काल से जुड़ा रहा है। तसर और कॉटन के कपड़ों को हाथ से तैयार कर इसमें बावन बूटी की डिजाइन की जाती है। यह बावन बूटी बौद्ध धर्म से जुड़ा है। कहा तो यह भी जाता है कि बावन बूटी साड़ी में बौद्ध धर्म की कला को उकेरा जाता है।

कपिलदेव प्रसाद जिले के पहले शख्स हैं, जिन्हें पद्मश्री सम्मान मिला। हालांकि, पिछले साल वीरायतन राजगीर की आचार्य चंदना श्री जी को पद्मश्री अवार्ड मिला था। जिनका कार्यक्षेत्र नालंदा जरूर रहा है लेकिन वे नालंदा की रहने वाली नहीं है।

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