मदर्स डे स्पेशल:पहले सिस्टर, पर अब हैं मदर रोज

कमल किशोर विनीत | राजगीर10 दिन पहले
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ममता की छांव में : राजगीर के चेतनालय परिसर में खेलकूद में शामिल महादलित बच्चियां। - Dainik Bhaskar
ममता की छांव में : राजगीर के चेतनालय परिसर में खेलकूद में शामिल महादलित बच्चियां।
  • अनाथ और गरीब परिवार की बच्चियों को स्वावलंबी बनाने वालीं सिस्टर रोज अपने सेवाभाव से हजारों लड़कियों की बन गई हैं मां
  • संवार रहीं जिंदगी : राजगीर के जंगली क्षेत्र पहाड़ की तलहटी में 22 वर्षों से अनाथ और मांझी परिवार की बच्चियों को कर रही हैं शिक्षित

बिहार के राजगीर आयुध फैक्टरी के पीछे निर्जन, बेहद शांत जगह जंगल में सिस्टर रोज का बसेरा है। इसका नाम उन्होंने चेतनालय रखा है। इसमें अभी करीब 200 अनाथ व मांझी परिवार की बच्चियों को मुफ्त में रहना, खाना, पढ़ाई-लिखाई करवा कर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने के काबिल बनाया जा रहा है। कई तो हुनरमंद बन अभी देश के कई शहरों में समाजसेवा से लेकर देशसेवा में लगी हैं। कई और इसी राह पर हैं। ऐसी ही है अमृता। रहती है बिहार के राजगीर के जंगली क्षेत्र में स्थित चेतनालय में। यहां रहकर वह पढ़ाई करती है। अभी सीबीएसई की दसवीं की परीक्षा दे रही हैं। महादलित किशोरी अमृता की मानें तो वह दसवीं की परीक्षा देने काबिल इसलिए बनी कि उसे सिस्टर रोज मिल गईं। सिस्टर रोज अब सिर्फ अमृता की ही नहीं बल्कि विनीता, रानी, संजू, सपना जैसी हजारों लड़कियों की मां बन गई हैं। अमृता कहती है- मैं जब छोटी थी, तब यहां आई थी। अब यहीं की होकर रह गई। रहना, खाना, पीना, पढ़ना-लिखना सब फ्री में। नहीं तो मेरे माता-पिता के पास इतने रुपए कहां कि मैं स्कूल जा पाती। इसी प्रकार की बात अन्य कई और लड़कियां बताती हैं।

केरल से 1967 में आई थीं बिहार
सिस्टर रोज मूलत: केरल की रहने वाली हैं। 1967 में बिहार आईं। इस संबंध में सिस्टर रोज का कहना है कि उनके माता-पिता उन्हें पढ़ा-लिखा कर देशसेवा के लायक बनाना चाहते थे। केरल में 1967 में एक जत्था आया और बताया कि बिहार में अकाल की स्थिति बन गई है। वहां सहयोग की आवश्यकता है। ऐसे में मेरे मन में भी आशा जगी कि बिहार जाकर लोगों की सेवा करें। केरल से बिस्किट और कुछ खाद्य सामग्री लेकर बिहार आई और फिर यहीं की होकर रह गई।

दो दशकों में कई मुश्किलें भी आईं, पर इन्होंने नहीं बदला रास्ता

नाजरथ हॉस्पिटल मोकामा में फिजियोथेरिप्सट बन गई। इस बीच पोलियो से पीड़ित बच्चे और बच्चियों की खोज कर उनका इलाज करने में जुट गई। फिर 2001 में पोलियोग्रस्त मात्र 5 बच्चियों के साथ इस चेतनालय आश्रम का शुभारंभ किया। अभी यहां 200 से ज्यादा बच्चियों पढ़-लिख रही हैं। यहां की बच्चियां पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ कला संगीत में भी निपुण हैं। सिस्टर रोज कहती हैं कि इन दो दशकों में कई मुश्किलें आईं, पर मेरा सफर जारी है।

मांझी परिवार की बच्चियां ही क्यों
सिस्टर रोज कहती हैं कि पहले तो मैं एक साल तक बिहार में गांव-गांव घूमी। फिर एक दिन अनायास मेरे सामने किसी गांव के संभ्रात व्यक्ति को देखा कि वह एक बच्ची को सुअर का बच्चा कह रहा है। मैं समझी नहीं। फिर हिंदी जानने वाले से समझा तो पता चला कि मांझी परिवार की बच्ची है इसलिए उसे इस संबोधन से पुकारा। इसके बाद इनकी स्टडी की तो चौंकाने वाली बात पता चली फिर मैंने निर्णय लिया कि इनके लिए कुछ करना है।

बीएड, नर्सिंग और मैनेजमेंट तक कर रही हैं लड़कियां

चेतनालय की सपना और प्रियंका अभी झारखंड के कोडरमा में नर्सिंग ट्रेनिंग कर रही हैं। इसी प्रकार जमशेदपुर में रानी बीएड, संजू नर्सिंग तथा रूक्मिणी मैनेजमेंट की पढ़ाई कर रही हैं। दरअसल यहां पर अभी आठवीं कक्षा तक के लिए अपना विद्यालय आश्रम परिसर में है। इसके बाद की पढ़ाई के लिए बच्चियां बाहर के स्कूलों में जाती हैं, पर रहना यहीं होता है। इन पर जो पैसे खर्च होते हैं वह सिस्टर ऑफ चैरेटी ऑफ नाजरथ से मिलते हैं। हालांकि 2011 से मार्च 2022 तक आॅस्ट्रिया के एक ग्रुप ने भी इसमें अपना सहयोग दिया है।

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