मगहिया दालान का ऑनलाइन कार्यक्रम:मिथिलेश बोले - लयात्मकता देती है कविता को गद्य से अलग पहचान; अन्य कवियों ने भी रखे विचार

नवादा5 महीने पहले
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आनलाइन काव्य संध्या में शामिल कवि। - Dainik Bhaskar
आनलाइन काव्य संध्या में शामिल कवि।

क्षण विशेष में भावों का लयात्मक प्रस्फुटन ही कविता है। लयात्मकता इसे गद्य से अलग पहचान देती है। मुक्त छंद को कविता पठनीय है, गेय नहीं। छन्दबद्ध कविता सहजता से कंठो पर चढ़ती है। मुक्त छंद में गद्यात्मकता अधिक होती है। इस कारण ही आज कविता से पाठक दूर होते जा रहे है। ऐसा कथन देश देशान्तर मगहिया दालान के 64 वां आनलाइन काव्य संध्या कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे सारथी पत्रिका के संपादक मगधेश जी मिथिलेश की है।

कार्यक्रम का संयोजन प्रेमी अनिलानंद ने किया। काव्य संध्या का शुभारंभ करते हुए संचालक कृष्ण कुमार भट्टा ने वर्तमान की विदुपता को रेखांकित करते हुए गजल सुनाई। कहा-ई कैईसन हवा चल रहल हे, की आदमी से आदमी डर रहल हे। गया कि सुरेंद्र जी ने गांव के अवमूल्यन को स्वर दिया।-टूट रहल गांव हमर, धरम और जाति में। मो खालिक हुसैन परदेशी ने सुकुमार भाव से जुड़ी ग़ज़ल सुनाई-अंखिया के राह तू दिल में उतर कर देख ला। दिल्ली के विशाल यादव ने विवाह में योग मांगने के विधान से जुड़ा लोकधुन पर पर गीत सुनाया-अगे माय गलिये गलिये घुमय हथिन दुलराइतो बेटी।

चर्चित गीतकार जयराम देवसपुरी ने कलम की महत्ता से जुड़ा गीत सुनाया- मन जब डोलय हई सतपथ के राही के।कलम बोलई हई अपन सिपाही के। डा. कुमार अनिल ने सामाजिक विषमता को मुक्त छंद में बांधा-हमर गांव के रमुआ कहार, रोज मिल जा है नदिया किनार। झारखंड के जयराम बिहारी ने बनजारी जिंदगी से जुड़ी कविता सुनाई- कइसन ई गोल गोल, लाल पीयर दप दप, केन बनजारी के मेवा। गया कि सुमन्त जी ने मौसम की तल्खी को स्वर दिया। मोर गर्मी के देख सबके अकबक में जान हे।

अरविंद जी ने मातृ भूमि के प्रति श्रद्धा जताते हुए सुनाया-हमर बिहार पावन भूमि हे, जेकरा पर्वतराज निहारो हे। दीनबंधु ने अतिक्रमण से बदलते गांव का चित्र खिंचा-आरी भेल डीधारी सगरो। नाला भेलो नल्ली, नवांकुर मीनू सिन्हा ने प्रकृति के प्रति गहरी संवेदना को स्वरबद्ध किया- कोयल के कुक सुने, मन तरस गेलो हल।डा राकेश सिन्हा रवि ने अपनी मातृभूमि को आकर्षण को बिषय बनाया- हमरा तो मगहे जांचय हे, बेस लगे गया जी के पानी।