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बिहार की राजनीति को प्रभावित करने वाले 4 नेता:RCP, सहनी, चिराग और प्रशांत किशोर की गतिविधियों पर सभी पार्टियों की नजर

पटना6 महीने पहलेलेखक: प्रणय प्रियंवद

बिहार की राजनीति के ये चार चेहरे ऐसे हैं जिन्होंने अपने समय में अपनी ताकत दिखाई है, लेकिन अब इनके सामने नया चैलेंज संगठन खड़ा करने या संगठन को विस्तार देकर भविष्य में अपनी ताकत सिद्ध करने का है। ये चार नाम हैं- आरसीपी सिंह, मुकेश सहनी, चिराग पासवान और प्रशांत किशोर। दिलचस्प यह कि इन चारों नेताओं पर सभी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों की नजर है।

राजनीतिक विश्लेषक ध्रुव कुमार कहते हैं कि इन चारों में सबसे मजबूत स्थिति में चिराग पासवान दिखते हैं। चिराग पासवान की छवि साफ-सुथरी है। लोक सभा चुनाव और विधान सभा चुनाव में एनडीए इनका बेहतर इस्तेमाल कर सकती है। आरसीपी और प्रशांत किशोर को अभी काफी कुछ करना होगा। मुकेश सहनी को भी अपनी जमीन तलाशनी होगी।

सबसे पहले इन चारों की ताकत को याद कीजिए, साथ ही भविष्य की संभावना भी जानिए-

आरसीपी सिंह- आईएएस रहे आरसपी सिंह तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार के ओएसडी थे। साथ रहते हुए उन्होंने नीतीश कुमार की पार्टी को आर्थिक और राजनीतिक रुप से ताकतवार बनाने में एक विश्वासी की भूमिका निभाई। एक समय था जब जदयू के कई बड़े फैसले आरसीपी ही लेते थे, लेकिन जब से वे केन्द्र में मंत्री बने उसके बाद से नीतीश कुमार से उनके रिश्ते खराब होते गए।

अब नीतीश कुमार ने भी कह दिया है कि आरसीपी अपनी मर्जी से केन्द्र में मंत्री बन गए। आरसीपी सिंह की खासियत रही कि वे बाकी नेताओं की तरह बयानबाज नहीं रहे। वे पर्दे के पीछे की राजनीति करते रहे। इस लिहाज से वे जदयू या नीतीश कुमार के बड़े राजदार में से एक हैं। लेकिन उनकी ही पार्टी जदयू ने उन पर गंभीर आरोप 2012 से 2022 के बीच अकूत संपत्ति अर्जित करने का लगाया।

इस बीच आरसीपी सिंह ने जदयू छोड़ दी। पार्टी छोड़ते हुए आरसीपी सिंह ने यहां तक कहा कि सात जनम में नीतीश कुमार पीएम नहीं बनेंगे। बाद में नीतीश कुमार ने भी उन पर कई आरोप लगाए और पार्टी को कमजोर करने का ठीकरा आरसीपी सिंह पर फोड़ा। बात यहां तक आई कि आरसीपी भाजपा से मिलकर जदयू को तोड़ने की तैयारी में थे।

भविष्य की संभावना- इसकी संभावना सबसे ज्यादा है कि देर-सवेर भाजपा आरसीपी सिंह को अपनी पार्टी में शामिल कर सकती है। आरसीपी सिंह अगर अपना संगठन खड़ा करते हैं तो इस पर भी लोगों की नजर है कि वे किस तरह सामने आते हैं। आरसीपी शार्प नेता हैं। वे चुपचाप बैठने वालों में नहीं। उन्होंने अपने ऊपर लगाए आरोप का भी जवाब सामने आकर दिया।

उन्हें जदयू की ओर से किसी जांच एजेंसी द्वारा या अन्य तरह से परेशान नहीं किया जाए इसके लिए किसी पार्टी का सहारा जरूरी हो सकता है। भाजपा आने वाले समय में नीतीश कुमार के विरोध में आरसीपी सिंह को आमने-सामने खड़ा कर सकती है। आरसीपी अपना अलग संगठन भी खड़ा कर सकते हैं। वे चुपचाप राजनीति से संन्यास ले लेंगे, ऐसा नहीं लगता।

आरसीपी सिंह (बाएं) और चिराग पासवान।
आरसीपी सिंह (बाएं) और चिराग पासवान।

चिराग पासवान- इनके पास दलितों के बड़े नेता रामविलास पासवान की विरासत हैं। वे उनके पुत्र हैं। रामविलास पासवान की खासियत यह रही कि आरक्षण की लड़ाई को दमदार तरीके से लड़ी। कई सरकारों में केन्द्रीय मंत्री रहे। वे देश के बड़े दलित नेता थे। बिहार में लालू प्रसाद और नीतीश कुमार से पहले उन्होंने राजनीति शुरू कर दी थी। नरेन्द्र मोदी लहर में चिराग पासवान सांसद बने और उन्होंने खुद को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का हनुमान कह कर 2020 के बिहार विधान सभा चुनाव में 135 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए। लेकिन सिर्फ बेगूसराय की मटिहानी सीट से राजकुमार सिंह चुनाव जीतने में सफल रहे जहां उन्होंने जदयू के बाहुबली उम्मीदवार बोगो सिंह को हराया। लोजपा ने दर्जन भर सीटों पर जदयू को नुकसान पहुंचाया।

चिराग ने कुछ सीटों पर भाजपा के खिलाफ उम्मीदवार खड़ा कर गड़बड़ कर दिया था। इसके बाद से भाजपा अंदर ही अंदर उनसे नाराज हो गई। उन्हें केन्द्र में मंत्री पद नहीं मिला, न रामविलाास पासवान की पत्नी को राज्य सभा भेजा गया, न रामविलास पासवान के आवास में उनके नाम का संग्रहालय खोला गया। चिराग ने भाजपा के साथ मिल नीतीश कुमार के साथ जो खेल खेला उसके बदले में नीतीश कुमार ने लोजपा को दो फांक में करवा दिया।

चाचा पशुपतिनाथ पारस की राष्ट्रीय लोजपा और भतीजे चिराग पासवान की लोजपा। चिराग ने खेल यह खेला कि बिहार में जदयू के खिलाफ रहे पर केन्द्र में एनडीए के साथ। चिराग की पार्टी के एकमात्र विधायक राजकुमार सिंह को नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी में मिला लिया।

भविष्य की संभावना- चिराग पासवान की सबसे बड़ी खासियत कि उनकी पार्टी लोजपा को ही बड़ा दलित वर्ग असली लोजपा मान रहा है। चिराग राजनीतिक मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय रखते हैं। भाजपा ने अभी तक उन्हें केन्द्र में एडीए से बाहर नहीं किया है। सांसद होने के बावजूद वे लगातार बिहार आते रहते हैं और पार्टी से जुड़े कार्यक्रमों में न केवल एक्टिव रहते हैं बल्कि अपने शुभचिंतकों के यहां भी उनका आना-जाना जारी रहता है।

वे नीतीश कुमार के विरोधियों में हैं। अब जब भाजपा और नीतीश कुमार का साथ छूट गया है तब चिराग की लोजपा खुले तौर पर भाजपा के साथ मिलकर बिहार में राजनीति कर सकती है। इससे लोजपा की ताकत भी बढ़ेगी।

मुकेश सहनी- सब कुछ के बावजूद एक साहसी नेता की छवि मुकेश सहनी ने बिहार की राजनीति में बनाई है। इन्होंने सन ऑफ मल्लाह के रुप में 2020 के बिहार विधान सभा चुनाव में नारा लगाया था माछ-भात खाएंगे तेजस्वी को जिताएंगे। लेकिन जब चुनाव में सीटों का बंटवारा करने का समय आया तो तेजस्वी यादव ने प्रेस कांफ्रेस में महागठबंधन की पार्टियों के उम्मीदवारों की घोषणा की और मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी को एक भी सीट नहीं दिया तो स्थिति बिगड़ गई।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही सहनी ने कहा- एक अतिपिछड़ा की पीठ में खंजर घोंपा गया। इसके बाद भाजपा ने विधान सभा चुनाव 2020 में सहनी को अपने हिस्से से 11 सीटें दीं। सहनी एनडीए के हिस्सा हो गए। उनकी पार्टी चार सीटों पर जीती। सहनी एमएलसी बनाए गए और बिहार सरकार में मंत्री भी। लेकिन सहनी के तीन विधायक को भाजपा ने अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। बोचहां के विधायक मुसाफिर पासवान का निधन पहले ही हो चुका था।

बोचहां उपचुनाव में सहनी ने अपना उम्मीदवार उतारा लेकिन उसकी हार हो गई। लेकिन सहनी ने लड्डू बांट कर खुशी दिखाई कि भाजपा को वहां हराने में उन्होंने भूमिका निभाई। भाजपा का गुस्सा सहनी पर इसलिए रहा कि यूपी विधान सभा चुनाव में सहनी भाजपा से भिड़ ही नहीं गए बल्कि बाजपा के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के खिलाफ बयानबाजी भी की। नीतीश कुमार ने भाजपा के दबाव में सहनी को मंत्रिपद से हटा दिया। सहनी एमएलसी फिर से एमएलसी भी नहीं बनाए गए।

भविष्य की संभावना- सहनी अपनी पार्टी वीआईपी को संगठन के रुप में मजबूत बनाने में लगे हैं। वे मछुआरों को अनुसूचित जाति का आरक्षण देने की मांग लगातार उठा रहे हैं। मछुआरों को एकजुट करने के लिए उनके पास यह सबसे बड़ा मुद्दा है। वे अपने समाज के लोगों को बता रहे हैं कि राजनीति साहस का खेल है।

पानी कितना भी उत्पाती क्यों नहीं हो, नाविक अपने साहस से नैया किनारे ले आता है। उन्होंने भाजपा और राजद दोनों से पंगा ले लिया है। हालांकि पिछले दिनों वे एम्स में लालू प्रसाद से मिलने गए थे। उनके सामने चैलेंज है कि वे मल्लाहों के नेता से आगे पूरे अतिपिछड़ा समाज के नेता के रुप में खुद को स्थापित कर पाते हैं कि नहीं।

अब प्रशांत किशोर बिहार में अपनी जमीन मजबूत करने में लग गए हैं।
अब प्रशांत किशोर बिहार में अपनी जमीन मजबूत करने में लग गए हैं।

प्रशांत किशोर- इलेक्शन स्ट्रेटजिस्ट के रूप में इनकी पहचान देश भर में रही है। भाजपा से लेकर जदयू और तृणमूल कांग्रेस तक के लिए इन्होंने काम किया। सफलता मिलने के बाद इनकी राजनीतिक धाक बढ़ गई। बिहार में नीतीश कुमार के लिए प्रशांत किशोर की टीम ने बूथ स्तर पर आंकड़ों की एनालिसिस, वोटर्स को नीतीश की ओर खींचने के लिए कैंपेन, वॉलन्टियर्स का मैनेजमेंट और सोशल मीडिया पर नीतीश के लिए साथी जुटाने का बड़ा काम किया। 'फिर से एक बार हो, नीतीशे कुमार हो, बिहार में बहार हो, नीतीशे कुमार हो,' जैसा गाना प्रशांत किशोर ने ही तैयार करवाया था, जो इलेक्शन में महागठबंधन का थीम सॉन्ग बना था। 2015 में जब लालू प्रसाद और नीतीश कुमार साथ होकर चुनाव लड़े इसमें प्रशांत किशोर ने बड़ी भूमिका निभाई। चुनाव नतीजों के बाद लालू और नीतीश के बीच में खड़े होकर फोटो खिंचाने की हैसियत प्रशांत की हो गई थी।

काफी समय नीतीश कुमार के साथ रहने और उनकी सरकार के लिए नीतियां बनाने के बाद उन्होंने नीतीश कुमार का साथ छोड़ दिया। हाल के महीने में प्रशांत किशोर ने कांग्रेस से नजदीकी बढ़ाई लेकिन कांग्रेस और प्रशांत किशोर के बीच बात नहीं बनी। अब प्रशांत किशोर बिहार में अपनी जमीन मजबूत करने में लग गए हैं।

भविष्य की संभावना- प्रशांत किशोर ने बिहार को लेकर अपना विजन लोगों के सामने रखा है। जन सुराज यात्रा की। हर जिले में अपनी राजनीतिक टीम बनाई और उनसे बातचीत की। वे खुद जाकर लोगों से मिल रहे हैं। वे बिहार में वैकल्पिक राजनीतिक का स्कोप तलाश रहे हैं। वे कहते हैं कि 30 साल के लालू और नीतीश के राज के बाद भी बिहार देश का सबसे पिछड़ा और गरीब राज्य है।

प्रशांत किशोर जानते हैं कि बिहार में जाति की जड़े गहरी हैं इसलिए वे एक ऐसे संगठन को खड़ा करने में लगे हैं जो इस सोच से ऊपर हो। लोकसभा या विधान सभा चुनाव से पहले प्रशांत जमीनी स्तर पर मजबूत संगठन खड़ा करने में लगे हैं। लोकसभा और विधान सभा चुनाव के समय वे अपना रंग दिखाएंगे।