• Hindi News
  • Local
  • Bihar
  • Bhaskar Interview With Film Critic Vinod Anupam From Bihar On Goa International Film Festival

इंडियन पैनोरमा के लिए चयन:220 फिल्में देखीं, बिहार से एक, वो भी नहीं चुनी गई; भोजपुरी, अंगिका, मगही से एक भी एंट्री नहीं

पटना25 दिन पहलेलेखक: प्रणय प्रियंवद
  • कॉपी लिंक

गोवा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन 21 से 27 नवंबर को होना है। इसमें दुनिया भर की चुनिंदा शॉर्ट फिल्म, डॉक्यूमेंट्री और फीचर फिल्में दिखाई जाएंगी। फिल्में चुनने के लिए 13 एक्सपर्ट की कमेटी बनाई गई है। बिहार से फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम इसमें रखे गए। विनोद अनुपम जमालपुर के रहने वाले हैं, लेकिन इधर लगातार पटना में रह रहे हैं। जूरी को सीरी फोर्ट ऑडिटोरियम में फिल्में दिखाई गईं।

दैनिक भास्कर ने विनोद अनुपम से बात की। उन्होंने बताया कि 23 दिन में 220 फिल्में देखीं। इसमें से 24 फिल्मों का चयन इंडियन पैनोरमा के लिए किया गया। इसमें असमिया, कन्नड़, तेलगू, गुजराती, हिंदी आदि फिल्में शामिल हैं। आश्चर्य यह कि इसमें भोजपुरी फिल्म से कोई एंट्री ही नहीं भेजी थी। अंगिका, बज्जिका, मगही जैसी बिहार की लोक भाषाओं से भी कोई एंट्री नहीं थी। मैथिली से मात्र एक फिल्म 'समानांतर' की एंट्री थी, लेकिन 'समानांतर' भी सेलेक्ट नहीं हो पाई।

पढ़िए, फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम से बातचीत

सवाल- बिहार में इस स्तर की फिल्में नहीं बन रही हैं कि गोवा फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जा सकें?
जवाब- बिहार में कोशिश ही नहीं की जाती है। न तकनीक के स्तर पर, न कथ्य के स्तर पर नयापन है, इसलिए बिहार की फिल्मों का चयन नहीं हो पा रहा है। इसमें कुछ नया दिखाना होता है।

सवाल- भारत की किस लोक भाषा में अच्छी फिल्में दिखीं?
जवाब- सबसे अच्छी फिल्में मराठी और फिर नॉर्थ ईस्ट की हैं। फ्रेश कहानी के साथ हैं। मणिपुर में कल्चर यूनिवर्सिटी है। दरअसल, डेवलपमेंट की परिभाषा हम अपने हिसाब से गढ़ लेते हैं। सिर्फ सड़क बना लेने से डेवलपमेंट नहीं हो जाता।

सवाल- नॉर्थ ईस्ट की फिल्मों की खासियत क्या-क्या है?
जवाब- नॉर्थ ईस्ट की फिल्मों में जमीन के एक्टर का चुनाव करते हैं, प्रोफेशनल एक्टर का नहीं। जिस गांव की फिल्म होती है, उसी गांव से एक्टर भी खोज लेते हैं। तकनीक पर ज्यादा ध्यान नहीं होता है। फिल्में ओरिजनल लोकेशन पर फिल्मायी जाती हैं, स्टूडियो में नहीं।

सवाल- बिहार को लेखन की दृष्टि से संपन्न माना जाता है, फिर अच्छी फिल्मों की समस्या यहां की लोक भाषा में क्यों है?
जवाब- बात लेखन की नहीं है। बिहार में कितनी जमीन की कहानियां लिखी जा रही है? यह एक बड़ा संकट है। अभी भी 71 के दौर के लेखन से हम नहीं निकल रहे जब भूमि आंदोलन चल रहा था। हमारे कल्चरल एसेट पर कितना लिखा गया? तीसरी कसम फिल्म में फोक दिखता था, कल्चरल एसेट दिखता था। रीति-रिवाज कितनी कहानियों में दिखते हैं। कितनी कविताएं छठ पर लिखी गई हैं? हमने अपनी सांस्कृतिक समृद्धि के बारे में सोचा ही नहीं। केरल, मलयालम, बंगला, नॉर्थ ईस्ट में अलग-अलग काम हो रहा है। सिर्फ किसी कहानी को ड्रामाटाइज कर देने से नहीं होगा। आज के दर्शक से जोड़ते हुए नॉर्थ ईस्ट की फिल्मों में रहन-सहन, लोक गीत सब दिखता है।

सवाल- गोवा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की ओपनिंग फिल्म के बारे में बताएं?
जवाब- कन्नड़ की एक जिले की भाषा जिसे संविधान में मान्यता नहीं प्राप्त है, पर उसमें काम हो रहा है। असम की लोक भाषा डिमिशा में 'शेमखोर' फिल्म बनी। शेमखोर एक गांव का नाम है। यह गोवा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की ओपनिंग फिल्म है। इसमें एक गांव की कहानी है। उस गांव का संकट, उसके रीति रिवाज, कैसे जंगल के बीच बसा है, कैसे शेर का खतरा होता है, यह सब इसमें है। यह एक गांव की जीवनशैली पर बनी फिल्म है। कहानी हम कहां से बनाते हैं, उस दिशा में काम करने की जरूरत है। हम कहानियां बाहर ढ़ूंढते हैं। यह अपने अंदर ढूंढने की चीज है।