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सरकार को फैसला लेने के लिए मजबूर होना पड़ा:IMA की मांग और हाईकोर्ट की सख्ती के बाद सरकार को लॉकडाउन का फैसला लेना पड़ा

पटना2 महीने पहले
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सरकार ने बिहार में पूर्ण लॉकडाउन लगा दिया है। इसकी मांग लगातार हो रही थी। माले को छोड़ पूरा विपक्ष लॉकडाउन के पक्ष में था। सभी यह चाहते थे कि ऐसा लॉकडाउन हो कि पिछली बार की तरह मजदूरों को आने में परेशानी न हो, निम्न आय वालों को खाने की दिक्कत नहीं हो। अभी जो लॉकडाउन लगाया गया है, उसके तहत सरकार ने PDS के तहत उपलब्ध होने वाले अनाज के लिए कोई भी राशि नहीं देने को कहा है। यह सरकार की ओर से फ्री होगा।

नीतीश सरकार PM के कहे अनुसार लॉकडाउन से परहेज करती रही
इससे पहले सरकार ने काफी कोशिश की कि लॉकडाउन नहीं लगाना पड़े, लेकिन बिहार में कोरोना का कहर थमने का नाम नहीं ले रहा। बिहार में संक्रमित मरीजों की संख्या 5 लाख के पार जा चुकी है। बड़ी संख्या में डॉक्टरों की भी मौत हो रही है। वे काफी खौफ में इलाज कर रहे हैं। ऑक्सीजन की किल्लत, अस्पताल में बेड की किल्लत, दवाओं की किल्लत से बिहार चौतरफा जूझ रहा है। सरकार की ओर से सुविधाएं पहले से ज्यादा की गईं, बेड भी बढ़ाए गए, IGIMS जैसे अस्पताल में कोरोना का इलाज फ्री किया गया, लेकिन अभी भी यह नाकाफी है। सरकार ने अपनी पूरी ताकत लगा दी कि प्रधानमंत्री के कहे अनुसार लॉकडाउन से परहेज किया जाए, लेकिन कोरोना से बिगड़ती स्थितियों की वजह से लॉकडाउन जरूरी हो गया।

पटना हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार किया
जब 3 मई को पटना हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब तलब किया कि आखिर लॉकडाउन क्यों नहीं लगाया जा रहा, इसका जवाब 4 मई को दें। कोर्ट ने सरकार को दबाव में लाने के लिए यहां तक कह दिया कि सरकार लॉकडाउन लगाएगी या नहीं लगाएगी बताए, वरना कोर्ट बड़ा फैसला लेगा। अब तक ऑक्सीजन की उपलब्धता को लेकर कोई ठोस एक्शन प्लान नहीं होने पर भी कोर्ट ने सिस्टम को फटकारा। कोर्ट को कहना पड़ा कि- ' पूरा सिस्टम कॉलेप्स्ड है।' कोर्ट ने सरकार की कई तरह से क्लास लगाई। बिहटा ESIC अस्पताल पूरी क्षमता के साथ शुरू नहीं करने पर भी कोर्ट ने नाराजगी जतायी।

लॉकडाउन टालने के लिए कई प्रतिबंध लगाए गए
सरकार ने लॉकडाउन को टालने की भरसक कोशिश की। इसके लिए 4 बजे के बाद दुकानों को बंद करने का निर्देश दिया। स्कूल, कॉलेज, कोचिंग और सार्वजनिक जुटान वाले स्थलों को बंद करने का निर्देश दिया। सरकारी ऑफिसों के समय और वहां उपस्थिति को कम किया गया। होटल में बैठकर खाने पर रोक लगायी गई। धार्मिक स्थलों में प्रवेश पर रोक लगी। इन सब प्रतिबंधों के बावजूद कोरोना का प्रसार बढ़ने की बजाय पसरता चला गया। सिर्फ अप्रैल माह में 989 लोगों की मौत कोरोना से हो चुकी है। अब तक बिहार में ढ़ाई हजार लोगों की जान कोरोना ने ले ली है। सरकार के आंकड़े पर विपक्ष ने सवाल भी उठाया है। विपक्ष का आरोप है कि कोरोना से होने वाली मौत का आंकड़ा सरकार के आंकड़े से काफी ज्यादा है। एक तरफ सरकार लॉकडाउन को लगातार टाल रही थी और दूसरी तरफ श्मशान घाटों पर लोगों को परिजनों की डेड बॉडी जलाने के लिए 14-15 घंटे का इंतजार करना पड़ा रहा है। आरोप यह भी लगता रहा कि बंगाल चुनाव की वजह से लॉकडाउन नहीं लगाया जा रहा है। बंगाल चुनाव भी हो गया और परिणाम भी आ गया। जब हद पार होने लगी तो पटना हाईकोर्ट को कड़ा रुख अख्तियार करना पड़ा और कोर्ट ने जनहित याचिका पर सुनवाई तेज कर दी। हाईकोर्ट की सुनवाई से पहले IMA ने भी लॉकडाउन की मांग की थी। इससे सरकार पर बड़ा मनोवैज्ञानिक दबाव था।

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