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सैफ अली के परिजनों को ‘भारत’ का टीका मंजूर नहीं:बिहार में कोरोना से पहली मौत जिसकी, उसके बुजुर्ग मां-बाप ने नहीं ली वैक्सीन, रिश्तेदार भी कर रहे इनकार

पटना2 महीने पहलेलेखक: मनीष मिश्रा
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तस्वीर में मो. सैफ अली अपनी मां, भांजे व अपने बच्चों के साथ। इनसेट में दामाद मो. साहब। - सभी फाइल फोटो - Dainik Bhaskar
तस्वीर में मो. सैफ अली अपनी मां, भांजे व अपने बच्चों के साथ। इनसेट में दामाद मो. साहब। - सभी फाइल फोटो

“जबरदस्ती दे देगा तो क्या करेंगे! वैसे, नहीं लेंगे। भरोसा नहीं है भारत के टीका पर। ससुर (मो. सैफ) को तो कोरोना था भी नहीं। हमलोग बॉडी बांधे, हमको तो नहीं हुआ कोरोना! घर में किसी-किसी को कोरोना बता दिया। ऐसे ही टीका भी भरोसे का नहीं है। उनके मां-बाप भी नहीं लिहिन हैं। हमारे आसपास, गांव-मुहल्ले में भी कोई नहीं एतबार कर रहा है। हम भी नहीं करते हैं। नहीं लेंगे यह टीका।”- बिहार में कोरोना से पहली मौत मुंगेर के जिस मो. सैफ की हुई थी, उनकी मौत के बाद उस घर की जिम्मेदारी संभाल रहे ममेरे दामाद मो. साहब ने भास्कर के सामने ऐसी ही तल्ख सच्चाइयां बयां कीं। साहब ने बताया कि कैसे उसके ससुर की मौत के बाद 4 लाख अनुग्रह राशि तो मिल गई, लेकिन राशन कार्ड बनवाने के लिए एक साल से दौड़ाया जा रहा है।

बिहार के 2000 परिवारों के लिए कोरोना का घाव कभी नहीं भरेगा

22 मार्च 2020 से मो. सैफ का पूरा परिवार संभाल रहे साहब

कोरोना से पहली मौत की बरसी पर भास्कर ने मृतकों की सूची से मो. सैफ का मोबाइल नंबर निकाला। इसपर बात की गई तो पता चला कि मो. साहब के पास यह मोबाइल रहता है। साहब मो. सैफ के ममेरे दामाद हैं। साहब की सास सैफ की सगी बहन थीं, वह बच्चों के साथ सैफ के घर में ही रहती थीं। बहन और उनके बच्चों का भी पूरा खर्च सैफ ही चलाते थे। बहन के इंतकाल के बाद भी पिछले साल 22 मार्च को मो. सैफ की कोरोना से मौत हो गई। सैफ की मौत के बाद अब साहब ही परिवार के गार्जियन है और सैफ की बीमारी से लेकर अब तक वह पूरी जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

दूसरी कंट्री का टीका आंख बंद कर लगवा सकते हैं, क्योंकि…

कई दिनों तक लगातार कोशिश के बाद साहब से मोबाइल पर कई दौर की बात हुई। शुरू में बातचीत से बचते रहे साहब से 21 मार्च को दैनिक भास्कर डिजिटल ने पूछा कि सैफ के परिवार में किन लोगों ने टीका लगवाया है? साहब ने साफ कहा- “नहीं लगावाएंगे। टीका सही नहीं है, इसलिए नहीं लगवाएंगे।” भास्कर ने सवाल किया कि जिस परिवार में कोरोना से मौत हुई हो, वहां टीके के लिए लोग गंभीर हैं और आप ऐसा बोल रहे हैं? साहब ने कहा कि “भारत में टीका पर राजनीति कर रहे हैं सब। जब कोई लक्षण दिखेगा तो टीका लगवाया जाएगा। पूरे विश्व में सबसे खराब राजनीति भारत की है। इसलिए हम लोग टीका नहीं लगवाना चाहते हैं। कोई दूसरी कंट्री टीका लगाए तो हम आंख बंदकर लगवा सकते हैं, लेकिन भारत का टीका नहीं लगवाएंगे। जहां राजनीति ज्यादा होती है, वहीं गड़बडी होती है। आसपास भी कोई नहीं लगवा रहा है, बस डॉक्टर लोग ही लगवा रहे हैं।” भास्कर ने साहब से कहा भी कि ऐसी भ्रांतियों से बाहर निकल कम-से-कम अभी के समय मो. सैफ के अब्बा-अम्मी को ही टीका लगवा दें, लेकिन वह तैयार नहीं दिखे। बताने लगे कि वह बाहर हैं। हालांकि अंत में यह जरूर कहा कि “सरकार जबरदस्ती लगाएगी, तो लगवा लेंगे।”

पहली मौत यही थी, पहला पॉजिटिव केस भी यही

बिहार में मो. सैफ अली का केस ही पहला पॉजिटिव केस भी था और मौत का भी यही पहला मामला था। दरअसल, मौत के बाद ही पॉजिटिव की पुष्टि हुई थी। 38 साल के सैफ अली मुंगेर सदर ब्लॉक के मूल बाशिंदे थे और अरसे से कतर में ड्राइवर का काम कर रहे थे। कोरोना का संक्रमण बढ़ा तो वह मार्च 2020 में कतर से गांव आ गए थे। गांव में ही किडनी की समस्या हुई और स्थानीय अस्पताल में डायलसिस कराई गई। हालत नहीं सुधरी तो परिजन एम्बुलेंस से पटना AIIMS आ गए। पटना AIIMS में आइसोलेशन वार्ड में रखकर इलाज किया जा रहा था। डॉक्टरों को कोरोना का संदेह हुआ तो 20 मार्च को नमूना लेकर जांच के लिए RMRI भेज दिया गया। 22 मार्च को रिपोर्ट आने से पहले मौत हो चुकी थी। मौत के बाद पॉजिटिव रिपोर्ट आते ही पूरे बिहार में सनसनी फैल गई थी।

मो. सैफ अली की फाइल फोटो।
मो. सैफ अली की फाइल फोटो।

सैफ अली पर था बड़े परिवार के खर्च का भारी बोझ

सैफ अली अपने पिता मो. जहांगीर के साथ कतर में रहते थे। पिता कतर में होटल चलाते थे और सैफ गाड़ी चलाते थे। सैफ की मौत के बाद पूरा परिवार टूट गया। पिता जहांगीर भी कतर छोड़कर वापस गांव आ गए। घर में सैफ की मां बानो के साथ सैफ की पत्नी, दो बेटियां और तीन बेटे हैं। साजिया और साइका काफी छोटी हैं। बेटों में सरफराज 17 साल, समीद 12 साल और शादाब 7 साल का है। सैफ की बहन और उनके दो बच्चे भी साथ रहते थे। बहन की मौत हो गई, लेकिन दोनों भांजे सैफ के घर ही रहते हैं। इस बड़े परिवार चलाने का पूरा जिम्मा सैफ पर ही था। सैफ की मौत के बाद उनके पिता भी वापस आ गए तो आय के स्रोत का हर दरवाजा बंद हो गया।

सैफ के बूढ़े बाप की चप्पल घिस गई, मगर नहीं बना राशन कार्ड

साहब ने भास्कर को बताया कि कैसे सैफ की मौत के बाद पूरा परिवार टूट गया है। कमाने वाला कोई नहीं है। सरकार ने कोरोना से मौत पर 4 लाख रुपए दिए थे। वह खत्म हो चुके। बीमा और अन्य डिपॉजिट भी खत्म होने पर है। बूढ़े पिता जहांगीर को लगा कि अगर राशन कार्ड बन जाता परिवार को काफी सहारा मिल जाता। खेती या कोई दूसरा साधन है नहीं। ऐसे में कार्ड से महीने का कुछ राशन तो मिल जाता। साहब बताते हैं कि पिछले एक साल से सैफ अली के पिता राशन कार्ड के लिए DM कार्यालय में दौड़ कर थक गए हैं, लेकिन किसी अधिकारी ने ध्यान नहीं दिया। बूढ़े आदमी की चप्पल घिस गई, लेकिन एक साल में राशन कार्ड नहीं बन सका है।

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