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छठ घाटों पर मिलते-बिछड़ते रहे लोग:24 घंटे में 4 सौ बिछड़े लोगों को प्रशासन ने उनके परिवार से मिलाया, सभी घाटों पर बनाया गया था खोया-पाया केंद्र

पटना5 दिन पहले
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पटना के छठ घाट पर बना खोया-पाया केंद्र।
  • 10 साल से कम उम्र के बच्चों को घाट पर आने की थी मनाही, वही सबसे ज्यादा परिवार से बिछड़े
  • दीघा के पाटीपुल घाट पर हर आधे घंटे में चार से पांच लोग अपने परिजनों से बिछड़ रहे थे

छठ पूजा के दौरान 24 घंटे में घाटों से 400 लोग अपनों से बिछड़ गए। प्रशासन की ऐसी चौकसी रही कि वह बिछड़ने के साथ ही मिल भी गए। बिछड़ने वालों में ऐसे लोगों की संख्या अधिक रही, जिन्हें प्रशासन ने घाट पर लाने से मना किया था। इनमें बच्चों के साथ वृद्ध लोग शामिल रहे। प्रशासन का कहना है कि सुरक्षा और संवाद की व्यवस्था ऐसी की गई थी, जिससे बिछड़ने वालों को उनके परिवार से मिलाने में समस्या नहीं हुई। अलग-अलग घाटों से मिली जानकारी के मुताबिक शुक्रवार और शनिवार को 24 घंटे में 4 सौ से अधिक बिछड़े लोगों को प्रशासन ने उनके परिजनों से मिलाया है।

हर आधे घंटे में चार से पांच लोगों के खोने की सूचना
दीघा के पाटीपुल घाट पर हर आधे घंटे में चार से पांच लोग अपने परिजनों से बिछड़ रहे थे। सबसे अधिक कलेक्ट्रेट घाट से लोग बिछड़ रहे थे। पटना सिटी के घाटों से भी लोग परिजनों से बिछड़ रहे थे। पाटीपुल घाट के राहत कैंप पर तैनात पुलिस और एनडीआरएफ के अधिकारियों का कहना है कि घाट काफी बड़ा है और भीड़ अधिक होने के कारण बच्चे घर वालों से बिछड़ जा रहे थे। बताया गया कि ऐसे बच्चों पर नजर रखने के लिए लोगों को लगाया गया था। कोई भी बच्चा अकेले दिखा या फिर रोते दिखा तो उसे पकड़कर राहत केंद्र पर लाया जा रहा था और फिर पब्लिक एड्रेस सिस्टम से अनाउंस कर उन्हें उनके परिजनों से मिलाया जाता था।

दावा करने वाले परिवार की ली जाती थी पूरी जानकारी और तस्वीर भी
डीएम पटना कुमार रवि ने बताया कि सुरक्षा को लेकर विशेष व्यवस्था की गई थी। भीड़ के दौरान सबसे अधिक समस्या बच्चों को लेकर थी, कोरोना के कारण बच्चों को मना किया गया था। इसके बाद भी 10 साल से कम उम्र के बच्चों को लेकर लोग घाट पर आ गए थ। ऐसे ही बच्चे परिवार वालों से बिछड़े। सहायता केंद्र पर तैनात पुलिस और अन्य कर्मियों का कहना है कि जो भी खोया हुआ आदमी कैंप में आता था, उसे बैठाया जाता था। खाने-पीने का सामान देने के साथ अनाउंस किया जाता था, जिससे उसके परिवार के लोग कैंप तक आ जाएं। हर पोल पर माइकिंग सिस्टम लगाया गया था, जिससे बिछड़ने वाले की जानकारी उनके परिवार वालों तक पहुंच जाती थी। जब परिजन कैंप पर आते थे तो बच्चे और उनके बीच संवाद कराया जाता था, इससे यह पता चल जाता था कि वह परिवार के हैं या नहीं। इसके बाद भी उनके बारे में पूरी जानकारी दर्ज करने के साथ संबंधित अधिकारी अपने मोबाइल से दोनों की सेल्फी ले लेते थे।

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