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बिहार में दो 'हनुमान' की लड़ाई, दोनों के आराध्य चुप:ललन को फायदा मिला तो दुश्मन को भरपूर नुकसान पहुंचाया, चिराग नुकसान पहुंचाकर भी फायदे के इंतजार में

पटना3 महीने पहलेलेखक: प्रणय प्रियंवद
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हनुमान यानी ऐसा भक्त जो अपने आराध्य के लिए कुछ भी करने को तैयार हो, जिसे मिटने की भी परवाह नहीं हो। बिहार की राजनीति में दो हनुमान दिख रहे हैं। एक हनुमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चिराग पासवान हैं, दूसरे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सांसद ललन सिंह। दोनों हनुमान ने अपने-अपने राजनीतिक आराध्यों को अपनी चालों से ताकत दी हैं।

PM नरेन्द्र मोदी के हनुमान की ताकत

  • विधानसभा चुनाव में BJP 21 सीटों के फायदे के साथ 74 पर पहुंची, JDU 28 के नुकसान के साथ 43 पर आई

बिहार की राजनीति में JDU-BJP के बीच अंदर ही अंदर पावर वार भी चलता रहा है। 2020 का विधानसभा चुनाव JDU-BJP ने साथ मिलकर लड़ा, लेकिन दोनों पार्टियां एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में भी लगी रहीं। ऐसे में चिराग पासवान ने नरेन्द्र मोदी का जयकारा लगाया, खुद को उनका हनुमान बताया और पूरा फोकस JDU की सीटें घटाने पर कर दिया।

BJP के उपाध्यक्ष रहे राजेन्द्र सिंह, नोखा के पूर्व विधायक रामेश्वर चौरसिया, पालीगंज की पूर्व विधायक उषा विद्यार्थी और झाझा के विधायक डॉ. रवीन्द्र यादव को टिकट दिया। ये चारों बिहार BJP के नामचीन चेहरे रहे हैं।

एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अभिवादन करते चिराग पासवान।
एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अभिवादन करते चिराग पासवान।

उस समय यह चर्चा थी कि LJP के जीतने वाले विधायक BJP को समर्थन दे देंगे। लेकिन इस राजनीति का अंत यह हुआ कि LJP के सिर्फ एक उम्मीदवार (मटिहानी से राजकुमार सिंह) ने JDU के नरेन्द्र सिंह उर्फ बोगो सिंह को हराकर जीत हासिल की। मोदी के हनुमान ने इस पर दुख प्रकट करने के बजाय कहा कि बिहार में नरेन्द्र मोदी की जीत हुई। उन्होंने ऐसा इसलिए कहा कि बिहार विधानसभा चुनाव में BJP 21 सीटों के फायदे के साथ 74 पर पहुंच गई और JDU 28 सीटों के नुकसान के साथ गिरकर 43 पर सिमट गई।

इस तरह बिहार की राजनीति में खुद को नरेन्द्र मोदी के हनुमान बताने वाले चिराग पासवान का मिशन पूरा हुआ, लेकिन उन्हें अब अपने वोट बैंक को भी संभालना है।

CM नीतीश के हनुमान की ताकत

  • LJP के 5 सांसद चिराग से अलग, इससे पहले एकमात्र विधायक और 208 नेता-कार्यकर्ता को तोड़ JDU में लाया

नरेन्द्र मोदी के हनुमान की राजनीतिक चालों के बाद बारी नीतीश कुमार के हनुमान की थी। हालांकि ललन सिंह ने कभी चिराग की तरह खुद को किसी का हनुमान नहीं कहा, लेकिन राजनीतिक चालें चलीं नीतीश के हनुमान की ही तरह। जब से नीतीश कुमार की सरकार बिहार में है, तब से उनकी पार्टी में एक बड़े रणनीतिकार के रूप में ललन सिंह रहे हैं।

मुंगेर से उन्होंने 15वीं लोकसभा का चुनाव जीता। बेगूसराय से भी लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। राज्यसभा सदस्य भी रहे। नीतीश कुमार से पार्टी फंड के उपयोग के सवाल पर अनबन हुई तो पार्टी छोड़ दी थी और नीतीश के खिलाफ तीखा बयान भी दिया था। 2014 में जब ललन सिंह मुंगेर लोकसभा का चुनाव हार गए तब नीतीश कुमार ने उन्हें एमएलसी बनाया और अपनी सरकार में मंत्री पद भी दिया। जबकि, वह सरकार महागठबंधन की थी और ये वही ललन सिंह थे जिन्होंने लालू प्रसाद के मामले की सुनवाई तेज करने की अपील सुप्रीम कोर्ट से की थी।

बिहार विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे की चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ सांसद ललन सिंह।
बिहार विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे की चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ सांसद ललन सिंह।

ललन सिंह की पैठ भूमिहारों में अच्छी है। मुलायम सिंह की सरकार में जो भूमिका अमर सिंह की होती थी वही, ललन सिंह की मानी जा रही है। अब इसी ललन सिंह की भूमिका LJP को तोड़ने में है।

खैरियत कहें कि BJP तेज निकली और आनन-फानन में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला से LJP के पांच सांसदों को मान्यता दिलवा दी गई। अलग गुट की मान्यता दी जाती तो पांचों नीतीश की पार्टी में जा सकते थे। इस सबके बावजूद ललन सिंह ने दिखा दिया कि हनुमान सिर्फ मोदी के पास नहीं हैं, नीतीश के पास भी हैं।

पांच सांसदों की टूट से पहले इसी साल 18 फरवरी को LJP के 18 जिलाध्यक्ष और 5 प्रदेश महासचिवों सहित 208 नेता JDU में शामिल हो चुके हैं। LJP के एकमात्र विधायक राजकुमार सिंह 7 अप्रैल को JDU में शामिल हो गए। नीतीश कुमार ने उन्हें JDU में शामिल कराया। उस समय नीतीश कुमार के साथ ललन सिंह, विजय चौधरी और अशोक चौधरी मौजूद थे। LJP को पूरी तरह से तोड़ने की इन तीन सफल कोशिशों में ललन सिंह की बड़ी भूमिका मानी जाती है।

साइलेंट ऑपरेशन करते हैं ललन सिंह

कहा जाता है कि नीतीश कुमार को जब भी परेशानी हुई और नीतीश कुमार ने ललन सिंह को इशारा किया है तो ललन सिंह ने दूसरी पार्टी में सेंध लगाई है। ललन सिंह इससे पहले भी बिहार में राजनीतिक दलों को तोड़ चुके हैं। बात चाहे कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी की अगुवाई में 4 MLC को तोड़ कांग्रेस को झटका देने का मामला हो या राजद के पांच MLC को तोड़ने का, ललन सिंह ने इतनी गंभीरता और गुपचुप तरीके से इन सारे ऑपरेशंस को अंजाम दिया कि दूसरी पार्टी के आलाकमान को जानकारी तक नहीं मिल सकी। ताजा मामला लोजपा का है, जहां हुआ भी कुछ ऐसा ही।

नरेन्द्र मोदी, चिराग के लिए क्या करते हैं, इसका इंतजार है

दिलचस्प यह कि ताजा राजनीतिक घटना पर दोनों हनुमान के आराध्य चुप हैं। चुनाव के समय नरेन्द्र मोदी चुप थे, अभी नीतीश कुमार चुप हैं। हनुमान अपना काम कर रहे हैं। राजनीतिक समझ रखने वाले कहते हैं कि ललन सिंह को हारने के बावजूद नीतीश ने मंत्री बनाया था, जीते हुए चिराग के साथ उनके आराध्य जरूर कुछ अच्छा करेंगे।

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