अभयारण्य में 5 हजार श्रद्धालुओं ने किया पिंडदान:यहां युधिष्ठिर ने महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने स्वजनों का किया था कर्म, श्रद्धालु अपने अनजाने पूर्वजों का भी श्राद्ध करते हैं

गयाएक वर्ष पहले
यहां आकर त्रिपिंडी श्राद्ध करने से श्रद्धालु के कई कुल के पूर्वज जिसे वह नहीं जानते हैं, उन सभी को मोक्ष मिलता है व पितृ प्रसन्न होते हैं।

पितृपक्ष में पिंडदान करने आए श्रद्धालुओं ने गुरुवार को बोधगया स्थित अभयारण्य में अपने पितरों के निमित श्रद्धा से पिंडदान किया। यह वही स्थान है, जहां भगवान श्रीकृष्ण के निर्देशन पर धर्मराज युधिष्ठर ने महाभारत के युद्ध में मारे गए अपने स्वजनों का पिंडदान किया था। त्रिपिंडी श्राद्ध सभी के लिए आवश्यक बताया गया है। यहां आकर त्रिपिंडी श्राद्ध करने से श्रद्धालु के कई कुल के पूर्वज जिसे वह नहीं भी जानते हैं, उन सभी को मोक्ष मिलता है।

त्रिपिंडी का मतलब ब्रह्मा, विष्णु और महेश को पिंडदान करना होता है। इनका ध्यान कर पिंडदान करने से पितर प्रेत व विभिन्न योनि से पूरी तरह से मुक्ति प्राप्त करते हैं। गुरुवार को करीब 5000 श्रद्धालुओं ने पिंडदान किया।

अह कूप को पलट कर नहीं देखते

पिंडदान करने वाले श्रद्धालु जब अह कूप में विभिन्न प्रकार के अन्न से बने पिंड छोड़ने जाते हैं तो उससे पहले एक बार कूप का दर्शन करते हैं। इसके बाद कूप के समक्ष पीठ कर खड़े हो जाते हैं और हाथ में लिए पिंड को सिर के ऊपर से कूप में छोड़ देते हैं। इसके बाद उन्हें कूप को देखना वर्जित माना जाता है।

यहां पूरे वर्ष कृष्ण पक्ष में किया जाता है त्रिपिंडी श्राद्ध

प्रेतबाधा व अन्य समस्याओं से परेशान लोग यहां आकर त्रिपिंडी श्राद्ध करते हैं। त्रिपिंडी श्राद्ध हर महीने के कृष्ण पक्ष के विशेष तिथियों में होता है। यहां त्रिपिंडी करने आने वाले लोग जिन पर प्रेत बाधा का असर रहता है, वह वैदिक विधान से पूजा शुरू होते ही स्वत: अजब-गजब हरकतें करते व आवाज निकालते हैं। इसके बाद पूजा की समाप्ति तक वह खुद ही शांत हो कर चले जाते हैं। उनकी हरकतें देख व आवाज सुन सामान्य आदमी कुछ पल के लिए सहम जाता है और बगैर इधर-उधर देखे अपने काम में तल्लीन रहते हैं। इस त्रिपिंडी श्राद्ध को करने के लिए सभी वर्ग के लोग अक्सर आते हैं।

कूप के समक्ष पीठ कर खड़े हो जाते हैं और हाथ में लिए पिंड को सिर के ऊपर से कूप में छोड़ देते हैं।
कूप के समक्ष पीठ कर खड़े हो जाते हैं और हाथ में लिए पिंड को सिर के ऊपर से कूप में छोड़ देते हैं।

अकाल मृत्यु वालों के लिए किया जाता है त्रिपिंडी श्राद्ध: आचार्य अरुण कुमार मिश्र

आचार्य अरुण कुमार मिश्र ने बताया कि यहां त्रिपिंडी श्राद्ध की विशेषता है। त्रिपिंडी श्राद्ध उन पूर्वजों के लिए किया जाता है, जो अकाल मृत्यु की वजह या किसी और कारण से प्रेत या किसी जीव योनि में चले गए हैं। उन्हें उस योनि से मुक्ति दिलाने के निमित ही यह अचूक त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है। साथ ही यह श्राद्ध पिंडदान करने वाले और उसके आगे की पीढ़ी को हर समस्या से मुक्ति प्रदान करता है।

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