जीत की कहानी आनंद कुमार की जुबानी / गरीबी से लड़ा, कभी खाना तक नहीं मिलता था, अब जापान में कर रहा पढ़ाई, मिले नौकरी के कई ऑफर

फाइल फोटो। फाइल फोटो।
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  • कोरोना संकट के बीच विपरीत परिस्थितियों में जीत की कहानीसुपर-30 के आनंद कुमार के शब्दों में
  • हर स्कूल में उसका सलेक्शन हुआ, लेकिन बड़े स्कूलों की फीस, ड्रेस और किताब-कॉपी का खर्च दिलीप के वश के बाहर की बात थी

दैनिक भास्कर

Mar 27, 2020, 10:46 AM IST

पटना.  वाराणसी में रहने वाले दिलीप कुमार गुप्ता के पिता मैकेनिक थे। बचपन में पढ़ने की बहुत इच्छा के बावजूद उनका यह सपना पूरा नहीं हो पाया। पैसे की तंगी के चलते दसवीं कक्षा में पहुंचने से पहले ही उनकी पढ़ाई छूट गई। कई शहरों में मेहनत-मजदूरी करते हुए गुड़गांव पहुंचे। यहां एक फैक्ट्री में जनरेटर ऑपरेटर का काम करने लगे। पत्नी और दोनों बच्चों के साथ किसी तरह गुजर-बसर कर रहे थे।
बड़े बेटे अभिषेक की छोटी उम्र से ही पढ़ाई में रुचि थी। अपनी हालत से दिलीप यह जान चुके थे कि शिक्षा ही उनके बच्चों का भविष्य बेहतर बना सकती है। अभिषेक जब स्कूल जाने की उम्र का हुआ तो वे उसे गुड़गांव के सबसे अच्छे स्कूलों में ले कर गए। हर स्कूल में उसका सलेक्शन हुआ, लेकिन बड़े स्कूलों की फीस, ड्रेस और किताब-कॉपी का खर्च दिलीप के वश के बाहर की बात थी। मन मसोसकर उन्होंने शहर के सबसे सस्ते स्कूल में उसका एडमिशन करा दिया।


अभिषेक शुरू से ही हर कक्षा में अव्वल दर्जे से पास होता। इसी दौरान एक दिन स्कूल में जापानी भाषा सिखाने वाले टीचर आए। वह जापानी भाषा सीखने लगा। भाषा सीखते-सीखते वह जापान के बारे में सोचता रहता और पता नहीं कब उसके मन में जापान जाने की इच्छा जाग गई। पिता यही सोचकर खुश थे कि विदेशी भाषा सीखने से वह गाइड का काम कर पाएगा, लेकिन कुछ दिनों बाद शिक्षक ने आना बंद कर दिया और जापान जाना तो दूर, वहां की भाषा सीखने की उसकी इच्छा भी अधूरी रह गई। निराश अभिषेक ने गणित में मन लगाना शुरू कर दिया। किसी ने बताया कि इंजीनियर बनने के लिए गणित में अच्छा होना जरूरी है तो उसे लगने लगा कि वह भी इंजीनियर बन सकता है।

वर्ष 2012 में उसे दसवीं की बोर्ड परीक्षा देनी थी। इसी दौरान दुर्घटना में पिता घायल हो गए। काम पर जाना बंद हो गया और आमदनी भी। हालत यह थी कि एक वक्त का भोजन मिलना भी बड़ी बात थी। लेकिन अभिषेक लगन से अपनी पढ़ाई करता रहा। उसने अच्छे अंकों से दसवीं की परीक्षा पास की। वह इंजीनियरिंग की कोचिंग करना चाहता था, लेकिन इसके लिए परिवार के पास पैसे नहीं थे। वह खुद ही तैयारी करने लगा। वर्ष 2014 में इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं में शामिल हुआ, लेकिन सफलता नहीं मिली। वह निराश हो गया। एक दिन जब उसके पिता फैक्ट्री में निराश बैठे थे, तो किसी ने सुपर 30 के बारे में बताया। इसके कुछ ही दिनों बाद अभिषेक मेरे सामने था। उसके चेहरे पर निराशा साफ झलक रही थी। वह आईआईटी में प्रवेश की तैयारी के लिए दिन-रात मेहनत करने लगा।


इसी बीच सुपर 30 की कामयाबी पर जापान में डॉक्यूमेंट्री बनी जो काफी चर्चित हुई। इससे प्रभावित होकर टोक्यो यूनिवर्सिटी ने संस्थान के छात्रों को मुफ्त शिक्षा देने का फैसला किया। अभिषेक ने सुना तो उसकी वर्षों पुरानी इच्छा एक बार फिर जाग उठी। उसे लगा कि उसके दोनों सपने - जापान जाना और इंजीनियरिंग की पढ़ाई करना, एक साथ पूरे हो सकते हैं। टोक्यो यूनिवर्सिटी की टीम छात्रों के चुनाव के लिए पटना आई। अभिषेक इसमें भी अव्वल रहा और आईआईटी प्रवेश परीक्षा से पहले ही टोक्यो यूनिवर्सिटी में उसका सलेक्शन हो गया। स्कॉलरशिप के साथ हर साल भारत आने-जाने का पूरा खर्च यूनिवर्सिटी उठाएगी। कल उसने फोन किया और बताया कि उसके लिए आगे जापान में ही नौकरी के कई अच्छे अवसर हैं।

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