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आपातकाल में भी रात में न जाएं गर्दनीबाग अस्पताल:भास्कर की पड़ताल में खुलासा- 24 घंटे इमर्जेन्सी सेवा का दावा, लेकिन, रात होते ही वार्ड बंद, डॉक्टर के साथ-साथ स्टॉफ भी नदारद

पटना2 महीने पहले
रात में गर्दनीबाग अस्पताल में सन्नाटा।

बिहार सरकार के सरकारी अस्पतालों में 24 घंटे इमरजेंसी सेवा का दावा पूरी तरह से फेल है। यहां दिन ढलते ही अस्पतालों में व्यवस्था सो जाती है। रात में इलाज की उम्मीद लेकर जाने वालों के हाथ निराशा लगती है। दैनिक भास्कर ने 24 घंटे इमरजेंसी सेवा के दावों के बीच जब रात में गर्दनीबाग अस्पताल की पड़ताल की तो यहां सन्नाटा दिखा। डॉक्टर की बात छोड़िए, कोई कर्मचारी भी यह बताने वाला नहीं था कि इलाज होगा या नहीं। यह उस अस्पताल का हाल है जहां सिविल सर्जन से लेकर अन्य अधिकारी का कार्यालय चलता है।

रात में गर्दनीबाग अस्पताल में सिर्फ एक गार्ड से मुलाकात हुई।
रात में गर्दनीबाग अस्पताल में सिर्फ एक गार्ड से मुलाकात हुई।

बड़ी आबादी का सहारा है गर्दनीबाग हॉस्पिटल

गर्दनीबाग अस्पताल पटना की एक बड़ी आबादी का सहारा है। यहां प्रसव से लेकर कुत्ता और सांप काटने के इलाज तक का दावा किया जाता है। मरीजों को भर्ती करने और इलाज के लिए पूरी व्यवस्था दी गई है। बेड के साथ ओटी तक की व्यवस्था के बाद भी यहां रात होते ही डॉक्टर से लेकर कर्मचारी गायब हो जाते हैं। इस हॉस्पिटल की मनमानी के कारण ही आस पास इलाकों में कई निजी अस्पतालों में मरीजों की भीड़ होती है। आस पास के एरिया में कोई अन्य बड़ा सरकारी अस्पताल नहीं होने से गर्दनीबाग से निराश मरीजों को प्राइवेट में ही सहारा मिल पाता है।

सुरक्षा गार्ड के अलावा कोई नहीं

गर्दनीबाग अस्पताल में गेट पर एक गार्ड मिला और बताया कि यहां सब व्यवस्था ऐसे ही चलती है। अंदर कोई भी स्टाफ नहीं मिला। आपातकालीन सेवा का वार्ड भी बंद मिला। प्रतीक्षालय में भी कोई नहीं मिला। यहां बाहरी कक्ष में भी पूरी तरह से सन्नाटा था। दवा भंडार का रूम भी बंद था। चिकित्सक कक्ष में कोई नहीं मिला। यहां पूरी तरह से सन्नाटा पसरा था। देखकर ऐसा नहीं लग रहा था कि कोई आया भी होगा। यहां लाइट बंद होने के कारण पूरी तरह से अंधेरा था। दवा वितरण कक्ष भी बंद था। उपाधीक्षक कक्ष में भी ताला लगा था। जांच घर से लेकर अल्ट्रासाउंड सब बंद था। अस्पताल में न कोई डॉक्टर न कोई नर्स और न ही कोई प्यून था, जिससे कोई जानकारी मिल सके। बताया जाता है कि रात में 8 बजे डॉक्टरों की ड्यूटी चेंज होती है।

गार्ड ने खोली व्यवस्था की पोल

अस्पताल में मौजूद एक गार्ड ने बताया कि वह भी बीमार हो गया था। सर्दी खांसी के साथ बुखार हो गया लेकिन अस्पताल से दवा नहीं मिल पाई। बताया गया कि अस्पताल में दवा ही नहीं है। ऐसे में सवाल यह है कि आम मरीजों का क्या होगा जो प्राइवेट अस्पतालों की मोटी फीस देने में असमर्थ हैं और जान बचाने के लिए सरकारी अस्पताल की तरफ भागते हैं।

ऐसे तो इमरजेंसी में नहीं बच पाएगी मरीजों की जान

इमरजेंसी में मरीजों की जान नहीं बच पाएगी। डॉक्टरों के नहीं होने से मरीजों को इमरजेंसी में भागना पड़ता है। डॉक्टर भी ऐसी लापरवाही इसी लिए करते हैं ताकि इमरजेंसी मरीजों को नहीं भर्ती करना पड़े। जबकि गर्दनीबाग अस्पताल को लेकर दावा किया जाता है कि यहां प्रसव की विशेष व्यवस्था है, यहां डॉक्टरों की कमी नहीं है। महिला डॉक्टरों की भी पर्याप्त संख्या में तैनाती है। सांप और कुत्ते के काटने पर भी तत्काल इलाज होता है। इस क्षेत्र में ऐसे मामले भी अधिक आते हैं लेकिन इमरजेंसी में लोगाें को उपचार नहीं मिलता है।

डॉक्टरों की तैनाती का खेल

गर्दनीबाग अस्पताल में डॉक्टरों की तैनाती का भी बड़ा खेल चलता है। यहां तैनात डॉक्टर सिविल सर्जन कार्यालय में बैठे रहते हैं। सिविल सर्जन कार्यालय से सेटिंग कर डॉक्टर ड्यूटी से भागते हैं। ऐसे में मराीजों को परेशानी होती है। डॉक्टरों की कमी के कारण कई डॉक्टर को बाहर से बुलाया गया लेकिन वह भी सिविल सर्जन कार्यालय में पड़े रहते हैं। पूर्व में तो उन्हें सिविल सर्जन ने संबद्ध किया लेकिन संबंद्ध समाप्त करने के आदेश के बाद भी अस्पताल में मरीजों को देखने वाला नहीं। बिहार सरकार के दावा जमीनी हकीकत पर पूरी तरह से फेल है। रात में इमरजेंसी में सरकारी अस्पताल आने वाले मरीज की पीड़ा बता सकती है कि सरकार के दावे की जमीनी हकीकत क्या है।

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