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बांसी नदी के किनारे रुकी थी राम-जानकी की बारात, VIDEO:बारात के नाम पर पड़ गए कई गांवों के नाम, जहां दासियां ठहरीं वो बना दहवा, जहां घुड़सवार रुके उसका नाम हो गया घोड़हवा

बगहाएक महीने पहले
बांसी नदी किनारे स्थित मंदिर।

बिहार और यूपी की सीमा पर बहने वाली बांसी नदी रामायण काल की कई यादों को अपने अंदर समेटे हुए है। इस नदी का वर्णन वाल्मीकि रामायण में भी है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक सिंघापट्टी गांव से होकर गुजरने वाली बांसी नदी के किनारे भगवान राम ने माता सीता और बारातियों संग रात बिताई थी। यही वजह है कि इस इलाके के कई गांवों का नाम बारात से जुड़ा हुआ है। जहां, दासियां ठहरी थीं। उनक नाम दहवा पड़ गया। जहां घुड़सवार रुके थे, उनका नाम घोड़हवा हो गया।

दासियों के नाम पर गांव का नाम दहवा।
दासियों के नाम पर गांव का नाम दहवा।

बांसी नदी में ही भगवान ने किया था स्नान
मान्यता के मुताबिक भगवान राम ने त्रेता युग में जनकपुर में माता सीता से विवाह के बाद अयोध्या के लिए रुख किया था। बांसी पहुंचते-पहुंचते दिन ढलने लगा था। देवरण्य क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध यह जगह जंगलों से घिरी हुई थी। नदी का किनारा होने के कारण काफी रमणीय भी था। इस वजह से भगवान राम की बारात यहीं रुक गई, रात्रि विश्राम किया। सुबह बासी में भगवान श्रीराम ने स्नान भी किया था। साथ ही शिव की पूजा के लिए खुद शिवलिंग की स्थापना की थी। इसके बाद आगे का सफर तय किया था।

बांसी नदी का इलाका काफी खूबसूरत है।
बांसी नदी का इलाका काफी खूबसूरत है।

रामघाट नाम से प्रसिद्ध है विश्राम स्थल
बांसी धाम से एक किलोमीटर पश्चिम की ओर बांसी नदी के किनारे रामघाट स्थित है। कहते हैं यही भगवान राम के रुकने का स्थान था। यहां एक राउटी डालकर भगवान ने रात बिताई थी। मतलब भगवान श्रीराम ने यहां पर एक रात वास किया था। जिसके बाद इस नदी का नाम बांसी पड़ गया । यहां पर एक मां जानकी का मंदिर भी है, जो काफी पुरानी है। लोग बताते हैं कि यहां पर माता जानकी उस रात को निवास किया था। इसलिए इस जगह का नाम जानकीनगर पड़ गया।

भगवान श्रीराम ने यहां भी की थी पूजा।
भगवान श्रीराम ने यहां भी की थी पूजा।

कई गांव का नाम बारात की दिलाती है याद
बांसी का यह क्षेत्र भगवान राम और उनसे जुड़े संस्मरण विभिन्न समय, काल और स्थान से जुड़े हैं। त्रेता युग में भगवान श्री राम के साथ पूरी बारात ने यही पर विश्राम किया था। अलग-अलग जगह तंबू डाले गए थे। जिसका जहां तंबू पड़ा उस जगह का नाम उसी से प्रसिद्ध हो गया। यहां इस प्रकार के नाम 3 किलोमीटर के रेडियस में मिलते हैं। विभिन्न नाम जैसे दहावा - लोग बताते हैं कि यहां मां जानकी के साथ चल रही दासियां ठहरी थीं इसीलिए इसका नाम दहावा पड़ गया। घोड़हवा - यहां पर बरात में आए घुड़सवार निवास किए थे। इसलिए इसका नाम घोड़हवा पड़ गया। इसके बगल में ही देवीपुर है। यहां पर एक सिंघापट्टी है। जिसे लोग बताते हैं कि यहां पर सिंघा बजाने वाले ठहरे थे। इसलिए इसका नाम सिंघापट्टी पड़ गया।

बारात के सबसे आगे स्वयं भगवान शिव चल रहे थे। और उन्होंने जहां निवास किया वह तिरलोकपुर के नाम से जाना जाता है। इसे आगे चलने पर उत्तरप्रदेश में पडरौना मिलता है। पडरौना का सबसे पुराना नाम पद रौन था। यानी पैर से रौंदा हुआ। लोग बताते हैं कि यह नगर श्रीराम और उनके भाइयों को ऐसा भाया की बारात से लौटने के दरमियान सभी भाइयों ने इस नगर का भ्रमण किया इसलिए इसका नाम पद रौन पड़ गया। बाद में यह पडरौना के नाम से जाने जाने लगा ।

मंदिर में स्थापित भगवान की मूर्तियां।
मंदिर में स्थापित भगवान की मूर्तियां।

भगवान राम ने स्थापित किया था शिवलिंग
सुबह स्नान के बाद भगवान श्रीराम शिव की आराधना करते थे। बांसी नदी तट पर रात्रि विश्राम के बाद सुबह स्नान पश्चात उन्होंने शिवलिंग बना कर पूजा की। घने जंगल मे स्थापित इस पिंडी के बारे में जानने वाले स्थानीय लोगों ने यहां पूजन-अर्चन शुरू कर दी थी। अब यहां आने वाला हर श्रद्धालु बांसीघाट पर इस शिव मंदिर में पूजन-अर्चन किए बगैर नहीं लौटता। ऐसी मान्यता है कि यहां नदी में स्नान करने से पुण्य मिलता है। जीवन के समस्त अवरोधों से मुक्ति मिलती। लेकिन यूपी-बिहार की सीमा में बहने वाली बांसी नदी में एक डुबकी लगाने से काशी में सौ बार जाकर स्नान-ध्यान करने का लाभ मिलता है। ऐसी पौराणिक मान्यता है।

रिपोर्ट- आदित्य उपाध्याय

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