हनुमान चालीसा देकर करा रहे घर वापसी:गया में धर्म बदलने वाले गांव में पहुंचा हिन्दू संगठन, लोगों को दी जा रही हनुमान चालीसा, पहना रहे हनुमान के लॉकेट

पटना3 महीने पहलेलेखक: शालिनी सिंह
हिंदू से ईसाई बने शख्स को भगवान हनुमान का लॉकेट पहनाते लोग।

गया के नैली प्रखंड के बेलवादीह गांव में धर्म बदल चुके लोगों की घर वापसी के प्रयास किए जा रहे हैं। एक हिन्दू संगठन से जुड़े लोग उनको वापस हिन्दू धर्म से जोड़ने में जुटे हैं। दैनिक भास्कर के पास इस गांव के कुछ वीडियो हैं, जिनमें धर्म बदल चुके दलित परिवारों को हनुमान चालीसा बांटी जा रही है। उनके गले में हनुमान के लॉकेट भी पहना पहनाए जा रहे हैं। इसके बाद उनसे जय हनुमान के जयकारे लगवाए जा रहे हैं।

धर्म परिवर्तन करने वाले परिवार दलित समाज से हैं। यह वो वर्ग है, जिसके लिए सरकार की ओर से कई कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं। इसके बावजूद गरीबी, भुखमरी और बीमारी से भी सबसे ज्यादा यही जूझ रहे हैं। अपने बच्चों को बीमारी से बचाने के लिए डॉक्टर और अस्पताल जाने की बजाय बेलवादीह गांव के लोगों ने अपना धर्म ही बदल लिया है। वे ईसा मसीह की प्रार्थना करने लगे। उनका दावा है कि वे प्रार्थना से स्वस्थ हो रहे हैं।

बेलवादीह गांव में अंधविश्वास की अजब कहानियां

बेलवादीह में धर्म परिवर्तन अंधविश्वास की अजब कहानियों से जुड़ा है। यहां जितने परिवारों ने धर्म परिवर्तन किया है उनकी अलग-अलग कहानियां हैं। इस गांव के भागन मांझी का कहना है भूत आता था, उसे भगाने के लिए दर्जन भर मुर्गा और खस्सी (बकरे) की बलि देनी पड़ती थी। ये सब कहां से लाते, इसलिए धर्म ही बदल लिया। इसी तरह सुखिया कहती हैं कि बहुत दिक्कत में थे। धर्म बदल लिया तो अब ठीक है। अब हमको हिंदू बनाने से क्या होगा, पूरा गांव ईसाई बन गया है। दूर-दूर तक यह धर्म फैला है, कहीं तो कोई फायदा होगा तभी ना ये इतना फैला है।

महिलाओं की मांग में अब भी सिंदूर और हाथ में चूडियां

बेलवादीह गांव में इन परिवारों की महिलाएं धर्म बदल चुकी हैं। हिन्दू से ईसाई बन चुकी हैं, लेकिन उनके धर्म में हुए बदलाव को उनके श्रृंगार से समझ पाना मुश्किल है। महिलाएं अब भी मांग में सिंदूर लगाती हैं और हाथ में चूडियां पहनती हैं। ये पूछने पर की मांग में सिंदूर क्यों? इस गांव की जगिया देवी कहती हैं, विधवा थोड़े ही हो गई हूं, जो सिंदूर ना लगाऊं। मतलब यह कि उनके लिए यह महज श्रृंगार नहीं। बल्कि, सुहाग की निशानी है, जिसे हटाना अब भी वो बहुत बुरा मानती हैं।

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