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1200 की साइकिल से चलीं 1200 KM:लॉकडाउन में बीमार पिता को लेकर आई ज्योति; PM मोदी ने भी किया 'स्त्री-शक्ति' को सलाम

पटना9 महीने पहलेलेखक: फिरोज अख्तर
  • राष्ट्रीय बाल पुरस्कार 2021 मिला, PM ने वर्चुअल संवाद किया

लॉकडाउन में जब सारा देश अपने घरों में कैद था, तब एक बेटी अपने बीमार पिता को साइकिल पर बैठाए अनजान सड़कों की खाक छान रही थी। गुरुग्राम से 1200 KM दूर गांव था। साइकिल से वहां तक जाने की कल्पना भी नामुमकिन थी, लेकिन 8वीं की छात्रा ज्योति ने यह साबित कर दिया कि बिहार की बेटी अगर ठान ले तो उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। अपने से कई गुणा अधिक वजन के पिता को साइकिल पर बैठाकर गिरती-संभलती हुई आखिरकार वह 8 दिन में 1200 KM का सफर तय कर गुरुग्राम से दरभंगा के सिरहुल्ली गांव पहुंच गई।

उपलब्धि विश्व कीर्तिमान से भी बड़ी

ज्योति की यह उपलब्धि ग्राफिक एरा हिल यूनिवर्सिटी के छात्र प्रदीप राणा के उस विश्व कीर्तिमान से भी बड़ी है, जिसमें प्रदीप ने 116 दिन में साइकिल से 15 हजार 261 KM का सफर तय करने का गौरव अपने नाम किया था। प्रदीप ने कीर्तिमान बनाने के लिए, जबकि ज्योति ने पिता की जान बचाने के लिए साइकिल चलाई। आज ज्योति देश ही नहीं, दुनिया भर में साइकिल गर्ल के नाम से मशहूर है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पुत्री इवांका ट्रंप ने भी ज्योति को सोशल मीडिया पर बधाई दी थी। एक महीने पहले PM नरेंद्र मोदी ने ज्योति से वर्चुअल संवाद किया, उसे राष्ट्रीय बाल पुरस्कार 2021 से सम्मानित किया।

ज्योति की कहानी उसी की जुबानी
गुरुग्राम में बैट्री गाड़ी चलाने वाले ज्योति के पिता मोहन पासवान 26 जनवरी को एक दुर्घटना का शिकार हो गए थे। ज्योति और उसके चार भाई-बहन अपनी मां फूलो देवी के साथ गुरुग्राम गए थे। मां आंगनबाड़ी में काम करती हैं, वह 10 दिन की छुट्‌टी लेकर गई थी। छुट्‌टी खत्म होने के बाद वह ज्योति को पिता की देखभाल के लिए गुरुग्राम में ही छोड़ कर बाकी बच्चों के साथ घर चली गई। कुछ दिन बाद लॉकडाउन लग गया। ज्योति ने बताया कि 60 हजार का कर्ज लेकर पिता का ऑपरेशन कराया गया था, लेकिन वे ठीक नहीं हो पाए थे। लॉकडाउन के चलते इलाज भी बंद हो गया। कुछ दिन मांग कर काम चलाया, उसके बाद भुखमरी की नौबत आ गई। मकान मालिक भी धमकी देता। घर जाने के लिए कोई साधन नहीं। ट्रेनें भी बंद थीं। ज्योति ने बताया- उसे लगा...अगर वह वहां रुकेगी तो भूखी मर जाएगी। फिर पिता को राजी किया और चल पड़ी गांव की ओर।

1200 की साइकिल से की 1200 KM की यात्रा
ज्योति ने बताया कि कोरोना राहत में उसके पापा को 1000 रुपए मिले थे। उसने 1200 रुपए में एक पुरानी साइकिल के लिए पड़ोस के अंकल से बात कर ली। उन्हें 500 रुपए तत्काल दे दिए और 700 रुपए बाद में देने की बात कही। इस पर वे राजी हो गए। ज्योति ने 500 रुपए रास्ते में खाने-पीने के लिए बचाकर रख लिए। 7 मई की रात को ज्योति 1200 की साइकिल से 1200 KM की यात्रा पर निकल पड़ी। कभी साइकिल से, कभी पैदल तो कभी थोड़ी दूर ट्रक वालों से लिफ्ट लेकर 8 दिन बाद 15 मई की शाम दरभंगा के सिंहवाड़ा स्थित अपने गांव सिरहुल्ली पहुंच गई। ज्योति ने रोजाना 100 से 150 किमी साइकिल चलाई।

पेट्रोल पंप पर रात गुजारती और वहीं फ्रेश होती
ज्योति ने बताया कि जब शाम ढलती तो वह रास्ते में किसी पेट्रोल पंप पर रुक जाती। उसे इस दौरान बिल्कुल भी डर नहीं लगा, क्योंकि पूरे रास्ते में लोगों की भीड़ रहती थी। देखकर राहगीर चौंकते, लेकिन कोई क्या कर सकता था। सब मुसीबत के मारे थे। सबको किसी तरह घर पहुंचना था। बहुत-से लोग पेट्रोल पंप पर ठहरते थे। ज्योति वहीं फ्रेश होती और अगली सुबह फिर से बीमार पिता को साइकिल पर बैठा कर निकल पड़ती।

आज हर कोई बनना चाहता है ज्योति
देश-दुनिया में साइकिल गर्ल के नाम से मशहूर हो चुकी ज्योति आज पूरे गांव की लड़कियों के लिए प्रेरणा बन गई है। ज्योति की मां ने बताया कि ज्योति की वजह से आज हम लोगों को बहुत सम्मान मिल रहा है। लोग आकर बधाई दे रहे हैं। हम लोगों ने सपने में भी नहीं सोचा था कि मंत्री और प्रधानमंत्री से हम लोगों की बात होगी, लेकिन यह सब ज्योति के कारण संभव हो सका। ज्योति को देखकर इस क्षेत्र की गरीब लड़कियां पढ़ने को जाती हैं। आसपास की लड़कियों को भी लगता है कि जब ज्योति इतना नाम कमा सकती है तो हम लोग भी पढ़-लिख कर कुछ कर सकती हैं।

पिता को मालूम भी नहीं, क्या होता है ब्रांड एंबेसडर ​​​​​​
ज्योति को नशा मुक्ति अभियान का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया है। उसके पिता मोहन पासवान ने बताया कि मुझे तो मालूम भी नहीं कि ब्रांड एंबेसडर क्या होता है। बाद में लोगों से पता चला यह तो बड़े-बड़े लोगों को बनाया जाता है। मैं अपनी खुशी कैसे बयां करूं, मेरी बेटी को इतनी कम उम्र में इतना सम्मान मिला। DM साहब के द्वारा जब हमलोगों को बताया गया कि प्रधानमंत्री जी से बात करनी है तो हमारी खुशी का ठिकाना नहीं रहा था।

इनपुट : दरभंगा से अलीन्द्र ठाकुर