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2 साल बाद भी JDU को एक ही मंत्रालय:2019 में ऑफर को ठुकराया; 20 में विधानसभा में तीसरे नंबर की पार्टी बनी तो 21 में कर लिया स्वीकार

पटना3 महीने पहलेलेखक: बृजम पांडेय
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JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष RCP सिंह और जदयू के ललन सिंह। - Dainik Bhaskar
JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष RCP सिंह और जदयू के ललन सिंह।

आखिरकार BJP की अकड़ के सामने जनता दल यूनाईटेड (JDU) को झुकना ही पड़ा। बात 2019 की है, जब BJP और JDU ने मिलकर चुनाव लड़ा। बिहार में JDU के 16 सांसद जीते तो BJP के 17 सांसद। पूरे भारत में BJP ने अपने दम पर बहुमत ले लिया था।

303 सांसद BJP की तरफ से जीते थे। तब मंत्रिमंडल का विस्तार हो रहा था। उस समय JDU को एक कैबिनेट मंत्री दिया जा रहा था, तब JDU के तात्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने यह कहते हुए ऑफर को ठुकरा दिया कि उन्हें तुलनात्मक हिस्सेदारी मिलनी चाहिए, यानी संख्या के आधार पर मंत्रियों की संख्या होनी चाहिए। BJP यदि सांकेतिक हिस्सेदारी देगी तो स्वीकार नहीं होगा। यह कहते हुए JDU ने मंत्रिमंडल में शामिल होने से इनकार कर दिया। हालांकि नीतीश कुमार ने कहा था कि JDU का समर्थन NDA के साथ रहेगा।

साल बदले, बात बदली। दिसंबर 2020 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से अपने आप को मुक्त कर लिया और यह जिम्मेदारी उनके सबसे करीबी RCP सिंह को दी गई। उससे पहले विधानसभा चुनाव में भी JDU का कोई खास प्रदर्शन नहीं रहा।

कार्यक्रम के दौरान एक दूसरे का अभिवादन स्वीकार करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। (फाइल फोटो)
कार्यक्रम के दौरान एक दूसरे का अभिवादन स्वीकार करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार। (फाइल फोटो)

विधानसभा में JDU तीसरे नंबर की पार्टी बन गई। हालांकि मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार को पेश किया गया था, इसलिए उन्हें CM बनाया गया। अब केंद्रीय मंत्रिमंडल में JDU शामिल हो रहा है, JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष RCP सिंह कैबिनेट मंत्री का शपथ ले रहे हैं।

  • सवाल यह है कि JDU ने जिस तुलनात्मक हिस्सेदारी का हवाला देकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने से मना कर दिया था, आज आखिर सांकेतिक हिस्सेदारी पर बात कैसे बन गई?
  • सवाल यह भी है नीतीश कुमार ने जब यह कह दिया था इस मसले पर वह कभी बात नहीं करेंगे तो, फिर नेतृत्व बदलने के बाद क्या नीतीश कुमार मजबूर हो गए ?
  • सवाल यह भी है कि JDU में RCP सिंह से बड़े कद वाले ललन सिंह को आखिर क्यों नहीं भेजा गया, जबकि RCP सिंह पहले से संगठन में राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर थे?
  • सवाल यह भी है कि नीतीश कुमार किस तरह से सामाजिक समीकरण साध रहे हैं। खुद कुर्मी होकर CM बने, कुर्मी RCP को केंद्र में मंत्री और JDU का राष्ट्रीय अध्यक्ष, कुशवाहा समाज से उपेंद्र कुशवाहा को संसदीय बोर्ड का चेयरमैन और उमेश कुशवाहा को प्रदेश अध्यक्ष क्यों?

नीतीश की मजबूरी नीतीश ही जानें

मंगलवार को CM नीतीश कुमार जब बाढ़ क्षेत्र का हवाई सर्वेक्षण करके लौटे तो उन्होंने साफ तौर पर यह कहा था कि अब वह संगठन को नहीं देख रहे हैं। RCP सिंह संगठन देख रहे हैं। पुरानी बातों को अब छोड़ दीजिए, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहेंगे वही होगा। इस बयान के बाद CM नीतीश कुमार ने केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार पर कुछ भी कहना मुनासिब नहीं समझा। जिस नीतीश कुमार ने यह कह कर पहले मंत्रिमंडल विस्तार में अपने आप को अलग रखा कि उन्हें तुलनात्मक हिस्सेदारी चाहिए, उन्हीं की पार्टी को BJP ने 2 साल बाद भी सांकेतिक हिस्सेदारी ही दी। इसके पीछे क्या मजबूरी रही, यह तो नीतीश कुमार ही बता सकते हैं, लेकिन नीतीश कुमार ने संगठन की जिम्मेदारी RCP सिंह को देने की बात कहकर इस मसले पर अपने आप को अलग कर लिया।

ललन सिंह को दरकिनार कर RCP को आगे करने पर सवाल

नीतीश कुमार जब से राजनीति कर रहे हैं, उनके संघर्ष के दिनों से लेकर अब तक राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह ने हर कदम उनका साथ दिया था। जब केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह देने की बात आई तो उन्होंने अपनी ही जाति समुदाय से RCP सिंह को कैबिनेट में मंत्री बनने के लिए हरी झंडी दे दी। जबकि, ललन सिंह JDU के फाउंडर मेंबर हैं। उससे पहले नीतीश कुमार और ललन सिंह समता पार्टी में भी रह चुके हैं। सामाजिक समीकरण की बात करें तो ललन सिंह भूमिहार समुदाय से आते हैं। वहीं, RCP सिंह कुर्मी समाज से आते हैं। हालांकि अभी तक ललन सिंह ने कोई बयान नहीं दिया है।

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