रामायण काल से हो रही यहां मां चामुंडा की पूजा:मान्यता है कि चंड-मुंड का वध करने के लिए मां ने लिया था अवतार, जमीन से 40 फीट ऊपर है मंदिर, देखें VIDEO

मुजफ्फरपुर17 दिन पहले
मां चामुंडा मंदिर शहर से करीब 40 KM दूर कटरा में स्थित है।

आज से नवरात्रि की शुरुआत हो गई है। आज हम आपको बता रहे हैं मां चामुंडा मंदिर के बारे में। यह मंदिर शहर से करीब 40 KM दूर कटरा में स्थित है। मंदिर के पुजारी कन्हाई मिश्र बताते हैं कि पूर्वजों के अनुसार, यहां पिंडी रूप देवी की पूजा रामायण काल से हो रही है। भव्य मंदिर का निर्माण काफी बाद में किया गया। माता ने चंड-मुंड दो राक्षस भाइयों के वध के लिए अवतार लिया था। मंदिर के कपाट रोजाना ही दोपहर 12 बजे से एक घंटे के लिए बंद किया जाता है। इस वक्त देवी के सोने का समय निर्धारित है। नवरात्रि में यहां हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि यहां सच्चे दिल से मांगी गई मन्नत जरूर पूरी होती है।

राजा जनक की कुलदेवी भी मानी जाती हैं
मां चामुंडा को वैष्णवी का स्वरूप माना गया है। इसलिए मंदिर में सिर्फ फल और मिष्ठान का भोग लगाया जाता है। माता के दर्शन के लिए तीन दिन सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को अहम माना गया है। मान्यता है कि वैसे तो सालों भर मां की कृपा अपने भक्तों पर बरसती है। मंदिर के पुजारी विजय शाही ने बताया कि जितनी मुंह, उतनी बातें सुनने को मिलती है। लेकिन, धार्मिक ग्रंथों में इस देवी स्थान को रामायण काल का बताया गया है। कहा जाता है कि ये राजा जनक की कुलदेवी थीं। मां का स्वरूप पिंडी आकार का है।

मंदिर के कपाट रोजाना ही दोपहर 12 बजे से एक घंटे के लिए बंद किया जाता है।
मंदिर के कपाट रोजाना ही दोपहर 12 बजे से एक घंटे के लिए बंद किया जाता है।

क्या है माता से जुड़ी कहानी
पुजारी विजय शाही बताते हैं कि पूर्वजों के अनुसार, एक बार पृथ्वी पर चंड-मुंड नामक दो राक्षस भाइयों ने जमकर उत्पात मचाना शुरू कर दिया था। उसी दौरान दोनों राक्षसों का वध करने के लिए मां ने अवतार लिया था। कहा जाता है कि कटरा में ही दोनों राक्षसों का वध कर मां ने पृथ्वी को बचाया था। उसी के बाद माता का नाम चामुंडा पड़ा। मंदिर के पुजारी कन्हाई मिश्र बताते हैं कि यह मंदिर बागमती और लखनदेई नदी के संगम पर है। यहां हर साल देश के विभिन्न कोनों समेत नेपाल से भी श्रद्धालु आते हैं। ऐसा माना जाता है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद मां हमेशा पूरी करती हैं।

जमीन से 40 फीट ऊपर है स्थित
पुजारी का कहना है की मां का पिंडी रूप खुद जमीन से बाहर निकला है। यह जमीन और मेन रोड से करीब 40 फीट ऊपर है। पहले यहां पर सिर्फ पिंडी थी। बाद में धीरे-धीरे मंदिर का भव्य स्वरूप दिया गया। अब यह मंदिर धार्मिक न्यास बोर्ड के अधीन है, जिसका संचालन मंदिर न्यास समिति द्वारा किया जाता है। वहीं, मंदिर के संबंध में सदियों से ये भी कहानी बताई जाती है कि मुगल वंश के शासक अकबर ने भी यहां पर मां को चुनरी चढ़ाई थी।

नवरात्रि के समय प्रतिदिन हजारों भक्त पूजा करने आते हैं।
नवरात्रि के समय प्रतिदिन हजारों भक्त पूजा करने आते हैं।

नवरात्रि में आते हैं हजारों भक्त
मंदिर न्यास समिति के सचिव सुरेश प्रसाद साह बताते हैं कि पिछले दो साल से कोरोना के कारण मंदिर का पट बंद था। सिर्फ मंदिर के पुजारी प्रतिदिन सुबह शाम पूजा-अर्चना और आरती करते थे। अब मंदिर आम श्रद्धालुओं के खुल चुका है। नवरात्रि के समय प्रतिदिन हजारों भक्त पूजा करने आते हैं। इसके लिए 200 से अधिक सेवा दल के सदस्य मौजूद रहते हैं। इसके अलावा जिला पुलिस बल के जवान भी भीड़ को नियंत्रित रखते हैं।

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