छठी मईया से बेटी मांगता नीलोत्पल मृणाल का खूबसूरत गीत:'दे द एगो सोनचिरैया' पर कहा- हमारे पर्वों में कम दिखती है बेटी की चाहत, देखें VIDEO

पटनाएक महीने पहलेलेखक: प्रणय प्रियंवद
नीलोत्पल मृणाल।

बिहार के लोक पर्व छठ के बारे में कहा जाता रहा है कि छठी मईया पुत्र की कामना पूरी करती है। इसलिए लोग छठी मईया से पुत्र की कामना करते हैं, लेकिन अब धारणा बदल रही है। नीलोत्पल मृणाल ने इस बार छठ से पहले 'दे द एगो सोनचिरैया' नाम का खूबसूरत गीत गाया है, जिसमें बेटी की चाहत है। यह छठी मईया से बेटी के लिए मनौती गीत है।

नीलोत्पल मृणाल ने गीत को सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए लिखा है कि 'छठ के गीतों में पुत्री जन्म की कामना, उसके द्वारा जिम्मेदारियों को उठाने के भरोसे का और उसी से कुल के उद्धार की आकांक्षा का ये गीत देश की सभी बेटियों को समर्पित है।' उनके इस गीत को सोशल मीडिया पर काफी सराहना मिल रही है। बिहार के गोपालगंज से आने वाले अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने भी इसे शेयर किया है।

भास्कर से कहा- लोक पर्वों में कम दिखती है बच्ची की चाहत
भास्कर ने नीलोत्पल मृणाल से बात की। वे कहते हैं कि हम बिहार-झारखंड के रहने वाले हैं। लोक पर्वों में बच्ची की चाहत कम दिखती है। छठ में भी लोग बेटों की चाहत करते हैं। भिखारी ठाकुर के गीतों में देखें तो गाते हैं.. गऊना ले जा सइयां...। छठ में एगो बेटा द दे त दउरा उठा के जाई... गीत महिलाएं गाती हैं। दउरा उठाने का भाव जिम्मेदारी से है और पुरुषों से जुड़ा है, जबकि गांव में कटनी से लेकर बाकी कई काम महिलाएं ही करती हैं, संभालती हैं। अब समाज बदला है लोग बेटों और बेटियों में अंतर नहीं कर रहे। इसलिए हमारे आस पास भी परिवर्तन की जरूरत है।

वे कहते हैं कि छठ के माध्यम से इस बात को बड़े परिप्रेक्ष्य में दूर तक पहुंचाया जा सकता है। भोजपुरी में बेटी के लिए गीत है, पर उसमें है कि बेटी होती तो बयना बांटती...यह भाव है। ऐसा हमारा समाज रहा है। पुत्रियों के लिए समाज में जगह कम है। अब जब बराबरी की बात हो रही है तो वह बात लोक के प्रतीकों में भी होनी चाहिए। इसलिए इस बार छठ के मौके पर मैंने यह गीत गाया है।

साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता हैं नीलोत्पल
नीलोत्पल चर्चित कवि हैं और गांव-गवंई वाले शब्दों को कविता में लाना उनकी खासियत है। उनका जन्म तो बिहार के मुंगेर के संग्रामपुर में हुआ, लेकिन पले-बढ़े झारखंड के दुमका के नोनीहाट में। डार्क हॉर्स, औघड़, यार जादूगर नाम की तीन किताबों से वे काफी चर्चा में आए। उन्हें साहित्य अकादमी ने युवा पुरस्कार प्रदान किया। 2012 में सिविल सर्विस की परीक्षा के पैटर्न में हुए बदलावों को लेकर नीलोत्पल ने छात्र आंदोलन का नेतृत्व भी किया था। उन्होंने नौ दिनों तक भूख हड़ताल की थी। वह उस समय भी काफी चर्चा में आए थे, जब कनॉट प्लेस के एक रेस्त्रां में उन्हें इसलिए प्रवेश से रोक दिया गया कि उनके कंधे पर गमछा था।

गीत में खास हैं ये पंक्तियां
उन्होंने 'दे द एगो सोनचिरैया' गीत में गाया है- मनसा के ललसा पुरइयै हो हे छठी मईया... मईया हो आंगना में दइ द ए गो सोन चिरैया...जे उड़ी के छूई आसमनवां...अ उहे बनी कुल के खवइया...। का करबअ अन्न, धन खजनवां हो... इहे चिरैइ जअई मैदनवां त देखिहो जीत के जीत के आई चांदी आउर सोनवां... अंगना में दइ द एगो सोन चिरैया...दाउरो के भार उठहिहो हे छठि मईया...।

ओलंपिक से लेकर छठ के दऊरा तक बेटियों की बात
वीडियो गीत में क्रिक्रेट के मैदान से लेकर ओलंपिक और आसमान की ऊंचाई तक में बेटियों का जलवा दिखाया गया है। छठी मईया से कहा गया है कि वह तो ब्रह्मा की बेटी है। वीडियो में महिला छठ का दउरा ले जाती हुई दिखती हैं। इस गीत के गीतकार और गायक दोनों ही नीलोत्पल मृणाल हैं। डायरेक्टर स्वेता दत्ता हैं। म्यूजिक दिया है प्रवेश मल्लिक ने और निर्माता हैं धीरेन्द्र ठाकुर।

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