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आंकड़ों में मर रहा कोरोना:चुनाव आते ही कोरोना जांच की रफ्तार हो गई कम, औसत में कोरोना का नहीं निकला दम

पटना8 दिन पहलेलेखक: मनीष मिश्रा
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कोरोना संक्रमण की जांच के लिए पटना के गार्डिनर रोड स्थित अस्पताल में जुटे लोग।
  • 16 अक्टूबर को 96685 जांच में बिहार में आया 1062 लोगों में संक्रमण का नया मामला

क्या चुनाव आते ही कोरोना मरने लगा है? ऐसा हम नहीं, सरकारी आंकड़े कह रहे हैं। कोरोना संक्रमण के उतार-चढ़ाव के आंकड़े और रिकवरी रेट छलांग लगा रहे हैं। बात 10 जुलाई 2020 की करें तो एक दिन में 7595 जांच पूरे प्रदेश में कराई गई, जिसमें 352 नए मामले आए। तब रिकवरी रेट 71.54 फीसदी थी, लेकिन 16 अक्टूबर को संक्रमण के मामलों का आंकड़ा 1062 और रिकवरी रेट 94.24 फीसदी था, जबकि जांच 96685 सैंपलों की हुई थी। अब सवाल यह है कि जब लॉकडाउन था तब रिकवरी का औसत कम था और अनलॉक में लापरवाही बढ़ी तो रिकवरी रेट के साथ मामले भी कैसे कम हो गए?

क्या है लॉकडाउन और अनलॉक का गणित
कोरोना के बढ़ते संक्रमण को लेकर पूरा देश लॉकडाउन में था। बिहार में भी लॉकडाउन का कड़ाई से पालन किया जा रहा था। आम लोगों में भी कोरोना को लेकर इतना खौफ था कि वह घर से बाहर नहीं निकल रहे थे। इस दौरान स्वास्थ्य विभाग भी काफी एक्टिव था। एक सूचना पर टीम जांच करने पहुंच जाती थी। संक्रमण की पुष्टि होते ही क्षेत्र संवेदनशील घोषित कर दिया जाता है। लेकिन अनलॉक होते ही यह व्यवस्था खत्म हो गई। कोरोना का चक्र तोड़ने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग का हथियार मजबूत माना गया है, लेकिन अनलॉक में तो यह दूरी भी सिमट गई है। अगर जांच की बात करें तो एक माह में 56471 जांच कम हुई है, लेकिन बात संक्रमित के नए मामलों की करें तो महज 436 का ही अंतर आया है।

जांच पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट
नालंदा मेडिकल कॉलेज के माइक्रो बायोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ संजय का कहना है कि आरटीपीसीआर और किट की जांच में बहुत अंतर है। आरटीपीसीआर में वायरस का लोड कितना भी कम होता है, लेकिन रिजल्ट आ जाता है। वहीं, किट की बात करें तो 20 से 25 प्रतिशत मामलों में संक्रमित की जांच भी पॉजिटिव नहीं आती है। यही कारण है कि किट की जांच से निगेटिव आने वाला मरीज आरटीपीसीआर की जांच में पॉजिटिव आया है। मौजूदा समय में लगभग 80 प्रतिशत जांच किट से ही हो रही है। किट की संवेदनशीलता कम होती है और यही कारण है कि इसमें वायरस का लोड कम होने पर जांच रिपोर्ट प्रभावित होती है। अब अगर इस जांच में संक्रमित निगेटिव आ जाएगा, लेकिन उसके संपर्क में आने वाले प्रभावित होंगे।

दवाएं नहीं, व्यवस्था भी घटी फिर भी रिकवरी रेट में टॉप
कोविड का न टीका आया और ना ही कोई नई दवा ही इजाद हुई। लक्षण के आधार पर पहले भी इलाज होता था और आज भी वही हो रहा है। बदलाव आया है तो व्यवस्था में, पूर्व में जो व्यवस्था थी अब आधी हो गई है। पहले पॉजिटिव के हर मामले अस्‍पताल में जाते थे, लेकिन अब होम आइसोलेशन की व्यवस्था है। इसके बाद भी कोरोना को मात देने वालों का प्रतिशत तेजी से बढ़ा है। 10 जुलाई को एक दिन में पूरे प्रदेश में 7595 जांच हुई जिसमें 352 लोगों में संक्रमण की पुष्टि हुई, रिकवरी रेट 71.54 बताया गया।

9 अगस्त को पूरे प्रदेश में 24 घंटे के अंदर 75628 लोगों की जांच हुई जिसमें 3934 लोगों में कोरोना संक्रमण पाया गया और तब रिकवरी रेट 64.37 था। 9 सितंबर को 153156 लोगों की जांच हुई जिसमें 1498 लोग संक्रमित पाए गए और रिकवरी रेट 89.22 पहुंच गया। लेकिन चुनाव आते 9 अक्टूबर को जांच घटकर 101855 पहुंच गई, जबकि संक्रमित का आंकड़ा जांच के हिसाब से कम नहीं हुआ इसमें 1155 संक्रमण के नए मामले आए और रिकवरी रेट 93.97 पहुंच गया। वहीं 16 अक्टूबर को जांच घटकर 96685 पहुंच गई और संक्रमण का मामला 1062 ही रहा यानि 6 दिन में संक्रमण का मामला 93 घट गया, लेकिन रिकवरी रेट 93.97 से 94.24 पहुंच गया।

आंकड़ों को लेकर यह भी दिया जा रहा तर्क
आंकड़ों को लेकर एक्सपर्ट का अपना अलग तर्क है। एक्सपर्ट डॉ संजय कहते हैं कि वायरस का तीन प्रमुख फैक्टर है। एक है हर्ट इम्युनिटी डेवलप होना और दूसरा प्रकृति के नेचर में बदलाव होना। मौजूदा समय में क्लाइमेट चेंज हो रहा है इसका भी असर भी कोरोना पर पड़ सकता है।

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