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कोरोना काल की पटना के 3 डॉक्टर फैमिली की कहानी:बोले- पहले लगता था डर, अब गर्व होता है कि जिंदगी लोगों के काम आ रही

पटना4 महीने पहलेलेखक: प्रणय प्रियंवद

कोविड की तीसरी लहर में भी डॉक्टर अपनी ड्यूटी पर बने हुए हैं। उनका भी परिवार है, बच्चे हैं। कोविड को वह ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं। डॉक्टरों के परिजन डरे हुए जरूर हैं, लेकिन परिजन ही उनके सबसे बड़े संबल हैं। परिवार की बदौलत ही वे हर दिन कोरोना से युद्ध करने अस्पताल पहुंच जा रहे हैं और शाम को जीत कर लौटते हैं।

IMA के आंकड़े के अनुसार, कोविड की दूसरी लहर में देशभर में 269 डॉक्टरों की मौत हुई थी। उसमें 78 बिहार के थे। बिहार में डॉक्टरों और टेक्नीशियन की कमी की वजह से PM केयर फंड से आए 200 से अधिक वैंटिलेटर नहीं चल पाए थे। बड़ी संख्या में एंबुलेंस भी पड़े रह गए। इन सबका असर डॉक्टरों पर पड़ रहा है।

डॉक्टरों की कम संख्या होने से इन पर वर्क लोड भी ज्यादा है। सब कुछ के बावजूद डॉक्टरों ने मोर्चा संभाला हुआ है। भास्कर ने इन सब मामलों को लेकर पटना के तीन सीनियर डॉक्टरों के परिजनों से बात की है।

परिवार बहुत बुरी परिस्थितियों से गुजरा, लेकिन लड़ना सीख लिया

डॉ राजीव कुमार सिंह पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (PMCH) में प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष हैं। वे छाती रोग विशेषज्ञ हैं। कोविड के पिछले दोनों फेज में मेडिकल की पढ़ाई कराने से लेकर मरीजों के इलाज तक की जिम्मेदारी निभाई। उनकी पत्नी रश्मि सिंह का कहा उनके ही शब्दों में पढ़िए...

मरीज का इलाज करते डॉ राजीव कुमार सिंह।
मरीज का इलाज करते डॉ राजीव कुमार सिंह।

डॉक्टर की पत्नी होने के नाते हर वक्त डर बना रहता है कि पता नहीं आज किस तरह के मरीज से मुलाकात होगी, लेकिन डॉक्टर हैं तो हर दिन अस्पताल जाना है। डॉक्टर साहब और हम सब कोविड की गिरफ्त में आकर ठीक हो चुके हैं।

सेकेंड फेज में तो हम लोग काफी डरे हुए थे। फैमिली के कुछ लोग संक्रमित हो गए थे। बहुत खराब स्थितियों से गुजरना पड़ा। ऊपर वाले की कृपा रही कि सब ठीक हो गए। डॉक्टर साहब सुबह निकले और शाम ठीक-ठाक घर आ गए। तब भी डर इसलिए रहता है कि किसी मरीज से कोविड संक्रमण का असर तुरंत नहीं दिखता है। इसमें दो-तीन दिन लग जाते हैं। इसलिए खतरा हमेशा बना रहता है, लेकिन हम लोगों ने कोविड से लड़ना-भिड़ना सीख लिया है। इस बात का संतोष होता है कि मरीजों की सेवा हो रही है। एक डॉक्टर के परिवार को सोसाइटी के लिए महामारी से लड़ना ही पड़ता है।

आगे कहती हैं कि थर्ड फेज में सेकेंड फेज की तरह पैनिक स्थिति नहीं है। अब लोग घर में ही आइसोलेट होकर ठीक हो जा रहे हैं। हम लोग घर में भी मास्क का इस्तेमाल करते हैं। घर में मेड से भी कहते हैं कि मास्क लगाकर काम करो।

घर के तीन लोग डॉक्टर, 2020 में लगता था बहुत डर

डॉ विभूति प्रसन्न सिन्हा इंदिरा गांधी आर्युविज्ञान संस्थान (IGIMS) के रीजनल आई इंस्टीट्यूट में प्रोफेसर और चीफ हैं। इसे बड़े रूप में डेवलप किया जा रहा है। डॉ सिन्हा की पत्नी निम्मी सिंह IGIMS में ही डेंटिस्ट हैं। इनकी एक बेटी नेत्रा प्रसन्न भी मेडिकल स्टूडेंट हैं और इंटर्नशिप कर रही हैं।

डॉ विभूति प्रसन्न सिन्हा और उनकी पत्नी निम्मी सिंह।
डॉ विभूति प्रसन्न सिन्हा और उनकी पत्नी निम्मी सिंह।

दूसरी बेटी नोयोनिका प्रसन्न भास्कर से बात करती हुई कहती हैं कि जब कोरोना की शुरुआत हुई थी 2020 में, तब बहुत डर लगता था कि मां-पिता और बहन तीनों अस्पताल जाती हैं। कितना खतरा है सब पर, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, मैं समझ गई कि तीनों के लिए रोजगार से ज्यादा यह फर्ज है। ये डॉक्टरों का जोश है कि हम इन्हें रोक नहीं सकते हैं। लोगों के प्रति ड्यूटी है। मुझे अपने मां-पिता और बहन पर गर्व होता है।

डॉ विभूति प्रसन्न की बेटी नेत्रा प्रसन्न।
डॉ विभूति प्रसन्न की बेटी नेत्रा प्रसन्न।

नोयोनिका कहती हैं कि अब हमें डर नहीं लगता, लेकिन कई तरह की सावधानियां बरतनी पड़ती हैं। डॉक्टर फैमिली के रूप में हमने देखा है कि कोविड में सावधानियां नहीं बरतने से कितना नुकसान है। कई लोग मास्क नहीं लगाते हैं और कुतर्क देते हैं। मैं कहना चाहती हूं कि जब डॉक्टर इतना योगदान कोरोना को भगाने के लिए दे रहे हैं तो बाकी लोगों को भी छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखना होगा। लोग मास्क लगाएं, सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें और सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें।

खुद पर प्राउड फील करती हैं पत्नी-बहू, लेकिन सावधानियां बरतते हैं

डॉ मनोज कुमार सिन्हा पटना के न्यू गार्डिनर रोड अस्पताल में निदेशक हैं। कोविड के सेकेंड फेज में इस अस्पताल ने भी डॉक्टरों को खोया है। बहुत तनाव का माहौल रहा, लेकिन डॉ सिन्हा हर दिन समय से अस्पताल पहुंच जाते हैं। कंकड़बाग में उनका आवास है। उनकी पत्नी रेखा सिंह और बहू पल्लवी सिंह से भास्कर ने बात की।

डॉ मनोज कुमार सिन्हा।
डॉ मनोज कुमार सिन्हा।

रेखा सिंह कहती हैं, 'हम बहुत गर्व महसूस करते हैं कि वे कोविड महामारी के तीनों फेज में फ्रंट लाइन वर्कर के तौर पर कार्य कर रहे हैं। डर तो लगता है, पर इससे लड़ने के लिए एक ही रास्ता है कि हम काफी सावधानियां बरते हैं। डॉक्टर साहब के कपड़े आदि हर दिन साफ करते हैं। सब कुछ सैनिटाइज होता है। इस सबके बावजूद डर लगा रहता है कि वायरस कभी भी हमला कर सकता है। हम सभी लोगों से यही कहना चाहते हैं कि सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा ध्यान रखिए, मास्क का इस्तेमाल करें, हाथ धोते रहें।

पत्नी रेखा सिंह और बहू पल्लवी सिंह।
पत्नी रेखा सिंह और बहू पल्लवी सिंह।

डॉ सिन्हा की बहू पल्लवी सिन्हा बताती हैं कि बहुत प्राउड फीलिंग होती है कि मेरे फादर इन लॉ एक डॉक्टर हैं और कोविड के समय मरीजों की मदद कर रहे हैं। हम उनसे मोटिवेट होते हैं। जब कोविड का वेब पहली बार आया था, तब हम लोग काफी डर गए थे, लेकिन डैडी से हमलोगों ने सीखा कि डरना नहीं है। इससे लड़ना है और इसे हराना है।

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