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पटना की महिला मूर्तिकार की कहानी:मूर्ति बनाकर 3 बेटियों की शादियां की, अब बाकी 5 बच्चों का पाल रही पेट; ससुर से सीखा था मूर्ति बनाना

पटना2 महीने पहले
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मूर्ति निर्माण कर अपने और अपने बच्चों का वर्षों से भरण पोषण करती आ रही है सुशीला। - Dainik Bhaskar
मूर्ति निर्माण कर अपने और अपने बच्चों का वर्षों से भरण पोषण करती आ रही है सुशीला।

नवरात्रि पर जानिए कहानी सुशीला की है जो फुलवारीशरीफ के छोटे कस्बे में रह कर मूर्ति निर्माण कर अपने और अपने परिवार के बच्चों का वर्षों से भरण पोषण करती आ रही है। सुशीला के ससुर बबलू पंडित ने फुलवारी शरीफ के टमटम पड़ाव पर 1950 में मूर्ति निर्माण का काम शुरू किया था। पिता की विरासत को उनके बेटे ललन पंडित ने भी बढ़ाया। 2003 में बबलू पंडित की मृत्यु के बाद उनके बेटे और उनकी बहू सुशीला देवी ने मूर्ति बनाने का काम शुरू किया। धीरे-धीरे दूरदराज से लोग मूर्ति निर्माण का ऑर्डर देने इनके पास आने लगे।

खाली समय में कोई काम नहीं रहता
दुर्गा पूजा, लक्ष्मी पूजा, सरस्वती पूजा के अलावा विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर इनके द्वारा मूर्ति निर्माण किया जाता रहा है। इन अवसरों के अलावा खाली समय में इनके पास कोई काम नहीं रहता, ऐसी स्थिति में मूर्ति निर्माण कर अर्जित किए गए रुपयों से ही गुजारा करते हैं। सुशीला देवी बताती हैं कि इनके 5 बेटी और तीन बेटे हैं। इनमें तीन बेटियों की शादी कर चुकी हैं। बड़ी बेटी आरती कुमारी अनिसाबाद लाल मंदिर के ठीक पीछे अपने पति भोला पंडित के साथ मिलकर वह भी मूर्ति निर्माण का काम करती है।

1 वर्ष में एक लाख रुपए के आसपास कमा लेती है
सुशीला देवी का कहना है कि मां दुर्गा की प्रतिमा के अलावा लक्ष्मी और सरस्वती की प्रतिमा का भी निर्माण भी करती हैं। इसके अलावा विश्वकर्मा पूजा में भी मूर्ति निर्माण का काम उनके घर में होता है। इस मूर्ति निर्माण से वह 1 वर्ष में एक लाख रुपए के आसपास कमा लेती है। इसी पैसे से सालों भर इनके और बच्चों का भरण-पोषण का काम होता है।

लॉकडाउन के कारण काम ठप पड़ गया था
पिछले 2 वर्षों से लॉकडाउन के कारण इनके घर मूर्ति निर्माण का काम लगभग पूरी तरह ठप पड़ गया था। तब कई दिनों तक इनके घरों में चूल्हा भी नहीं चल सका था। इस बार परिवार के बच्चों के चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट नजर आ रही है। सुशीला देवी का मानना है कि अगर कुम्हार समुदाय के लोगों को सरकार बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य के लिए आर्थिक मदद करें, तो इनका परिवार भी बदहाली की जिंदगी से उभर खुशहाली की जिंदगी जी सकता है।

रिपोर्ट: ज्ञानशंकर

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