बिहार म्यूजियम में शैलेन्द्र कुमार की फोटो प्रदर्शनी देखिए:गंगा किनारे रहने वाले लोगों का संघर्ष और बिहार का कल्चर दिख रहा फोटो में

पटना7 महीने पहलेलेखक: प्रणय प्रियंवद
शैलेन्द्र कुमार की फोटो प्रदर्शनी।

इन दिनों बिहार म्यूजियम में पटना के फोटोग्राफर शैलेन्द्र कुमार की फोटो प्रदर्शनी लगी है। यहां उनके लगभग 42 वर्षों की फोटोग्राफी में से चुनिंदा फोटो का कलेक्शन है। इसमें बिहार की माइथोलॉजी को खूबसूरती से इन्होंने सामने रखा है। कई ऐसे दृश्य है जो अब दिखते भी नहीं। शैलेन्द्र 1972 में जब 7 वीं क्लास में थे तब की पेटिंग भी लगायी है। इन पर उनके टीचर के सिग्नेचर भी हैं।

एक लंबी सीढ़ी से सिक्किम में एक बच्चे को जब शैलेन्द्र ने उतरते देखा तब की क्लिक देखने लायक है। भुवनेश्वर की 64 योगिनी को उनकी सवारी के साथ सामने लाया है। एक तस्वीर इसमें खाली है। शैलेन्द्र पेटिंग से फोटोग्राफी में आए इसलिए उसका असर भी दिखता है। डेक्रोमेट फोटोग्राफी के भी कई नमूने इन्होंने प्रदर्शित किया है जिसे सीखने वे शांति निकेतन में अर्पण मुखर्जी के पास गए थे।

विभिन्न फोटो में बिहार का कल्चर
विभिन्न फोटो में बिहार का कल्चर

तब सभी छठ व्रती सफेद धोती को हल्दी से रंगकर पहनती थीं

पटना की गंगा को कई फोटोग्राफी में शैलेन्द्र दिखाया है। गंगा में बालू निकालते हुए मजदूर, गंगा किनारे नाव में घर बनाकर रहते लोग, लोक पर्व छठ मनाते लोग दिखते हैं। पटना की गंगा, हाजीपुर की गंगा, देव में छठ, बड़गांव नालंदा में छठ करती महिला, बड़गांव में लोग कैसे टेंट लगाकर छठ मनाते रहे हैं, वह सभ अलग-अलग फोटो में है। सबसे दुर्लभ वह तस्वीर है जिसमें महिलाएं हल्दी से धोती को रंग पहनकर छठ करती दिखती हैं।

यह तस्वीर नालंदा खंडहर के पीछे के बड़गांव की है। बाढ़ के पहले की गंगा और बाढ़ के बाद की गंगा की तस्वीर भी यहां है। गंगा नदी घाटी के किनारे रहने वाले लोंगो का दर्द इसी क्रम में दिख जाता है। गया के पिंड दान की वह फोटो महत्वपूर्ण है जिसमें हर व्यक्ति के आगे एक छोटा सा गड्ढा खुदा हुआ दिखता है जिसमें से पानी निकाल कर पिंड दान किया जाता है। मिट्टी की दीवार पर पानी के निशान किस तरह के हैं उसे मिट्टी सीरीज की फोटोग्राफी में दिखाया है। बनारस घाट पर भी सीरिज में फोटोग्राफी की है इन्होंने।

बिना ड्रोन के इन फोटो को लेने के लिए बहुत ऊंची जगह पर चढ़ना होता था

कई फोटो काफी ऊंचाई से ली गई हैं। तब ड्रोन का जमाना था भी नहीं। मुजफ्फरपुर के बोचाहां गांव में लहठी बनाने वाली हिंदू-मुस्लिम महिलाओं की तस्वीर लगाई है। गया के विष्णुपद मंदिर की वह फोटो दुर्लभ है जिसमें लोग दान देने के साथ ही टाइल्स पर अपना नाम लिखवा कर मंदिर को दे देते थे। इसे मंदिर प्रशासन जमीन पर लगवा देता था और उसी पर लोग चलते भी थे। अब उसे हटवा दिया गया है। हाजीपुर हरिहर नाथ मंदिर से लेकर बरसाना तक के उत्सव की तस्वीर भी इन्होंने यहां लगाई है।

पुराने कैमरों की दुर्लभ प्रदर्शनी
पुराने कैमरों की दुर्लभ प्रदर्शनी

100 साल पुराने कैमरे से लेकर अब तक के कैमरे की प्रदर्शनी

पुराने कैमरों की प्रदर्शनी यहां दुर्लभ है। 100 साल पुराने कैमरों से लेकर अब तक के कैमरे यहां दिखते हैं। डेढ़ सौ कैमरों की प्रदर्शनी यहां है। जाने-माने फोटोग्राफर राय चौधरी का इस्तेमाल किया हुआ कैमरे भी यहां है। इनमें से ज्यादातर कैमरों में लगाने के लिए अब रील भी नहीं मिलते और उसकी प्रोसेसिंग भी मुश्किल है।