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अलविदा रामविलास:'गूंजे धरती आसमान, रामविलास पासवान' के नारों से गूंज उठीं पटना की सड़कें, अंतिम यात्रा में हर आंखें थीं नम

पटना3 महीने पहलेलेखक: शालिनी सिंह
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  • एसके पुरी स्थित आवास से निकली शव यात्रा में उमड़ा प्रशंसकों का हुजूम, हर आंख अंतिम दर्शन को दिखी बेचैन

गूंजे धरती, आसमान- रामविलास पासवान...लेकिन आज आसमान चुप था, धरती चुप थी, बस आंखें बेसुध सी बरसती जा रही थीं। ये विदाई थी उस नेता की जिसे बिहार में दलित राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा माना जाता था। जिसे राजनीति का मौसम वैज्ञानिक कहा जाता था और जिसके बंगले से सत्ता के शीर्ष तक जानेवाले दरवाजे की चाभी निकलती थी। आज जब एसके पुरी स्थित उनके घर से उनकी अंतिम विदाई हो रही थी तो हजारों की भीड़ थी, लेकिन उसमें आवाज नहीं थी, क्योंकि उनकी आवाज रामविलास पासवान हमेशा के लिए चुप हो गए थे।

रामविलास पासवान की आवाज दलितों की वो आवाज कही जाती थी जो सड़क से लेकर संसद तक गूंजती थी। विधायक से लेकर सांसद और फिर केंद्रीय मंत्री तक के अपने सफर में रामविलास पासवान ने कभी अपनी पहचान को नहीं छोड़ा ना कभी उसे बदलने की कोशिश की। उनके इसी अंदाज का असर था कि 1977 में इंदिरा गांधी द्वारा हाजीपुर में उनके खिलाफ चुनाव प्रचार के बाद भी रामविलास ने रिकॉर्ड मतों से लोकसभा का वह चुनाव जीता। इस जीत को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया। रामविलास पासवान की इस जीत ने देश की राजनीति को समझने का दावा करनेवाले राजनीतिक विशेषज्ञों और नेताओं को ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि अब राजनीति में बदलाव की बयार बह चुकी है। अब नेता बनने की बारी मंच पर चमकने वाले चेहरों की नहीं बल्कि भीड़ का हिस्सा बनने वाले नेताओं की है।

रामविलास पासवान के पार्थिव शरीर को सेना के वाहन पर रखते लोग।
रामविलास पासवान के पार्थिव शरीर को सेना के वाहन पर रखते लोग।

रामविलास पासवान की अंतिम यात्रा धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और इसी के साथ भीड़ में मौजूद हर शख्स की उनसे जुड़ी यादें ताजा हो रही थीं। दलितों के सामाजिक संघर्ष को समझाते हुए एक बार रामविलास पासवान ने कहा था कि मैं जानता हूं मेरे पिताजी को अगर कोई एक तमाचा लगा देता या बैठने के लिए जगह ना देता तो खून का घूंट पीकर रह जाते, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। अगर ऐसा कुछ होता है तो हम इसके खिलाफ कुछ भी करेंगे।

शवयात्रा अब पटना के बोरिंग कैनाल रोड पहुंच चुकी है। पटना की व्यस्त सड़क आज थम गई है। अपने उस नेता के लिए जिसने मिट्‌टी के घर से सफेद मार्बल से सजे महलनुमा घर में बैठे राजनीति के महारथियों को अपने दलित समाज की आवाज सुनने पर मजबूर कर दिया था। सड़क के दोनों किनारों पर भीड़ थी। रामविलास पासवान के अंतिम दर्शन के लिए जुटी भीड़ में किसी की कोई जाति नहीं थी। कुछ लोग घरों की छत से देख रहे थे तो कुछ अपनी छोटी बालकनी से।

सेना के वाहन पर रखे जाने से पहले पिता के पार्थिव शरीर को कंधा देते चिराग पासवान।
सेना के वाहन पर रखे जाने से पहले पिता के पार्थिव शरीर को कंधा देते चिराग पासवान।

जैसे-जैसे अंतिम यात्रा आगे बढ़ती गई वैसे-वैसे इसमें लोगों की तादाद भी बढ़ती गई। अब यात्रा बेली रोड पहुंच चुकी थी। रामविलास पासवान अमर रहें के नारों की गूंज गाड़ियों से निकलने वाले हार्न को दबा रही थी। लगभग 10 किलोमीटर लंबी अंतिम यात्रा में सड़कों के दोनों तरफ की भीड़ खत्म नहीं हो रही थी।

इस भीड़ में आम चेहरों के बीच, कई खास चेहरे भी मौजूद थे। केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद भी अपने सहयोगी की अंतिम यात्रा का हिस्सा थे। वे शुक्रवार की रात पार्थिव शरीर के साथ ही विशेष विमान से आए थे।

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