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जानिए कैसे बिना डिग्री जीत गईं जिंदगी:यह 5 खुद तो आगे बढ़ी हीं, समाज की अपने जैसी महिलाओं की मदद भी कर रहीं

पटना9 महीने पहलेलेखक: प्रणय प्रियंवद
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श्रमिक फाउंडेशन के कार्यक्रम में शामिल हुईं लक्ष्मी देवी, उर्मिला सिंह, रीना गुप्ता, रश्मि तसलीम, कंचन देवी। - Dainik Bhaskar
श्रमिक फाउंडेशन के कार्यक्रम में शामिल हुईं लक्ष्मी देवी, उर्मिला सिंह, रीना गुप्ता, रश्मि तसलीम, कंचन देवी।
  • उन महिलाओं की कहानी जिनके पास बड़ी डिग्री की जगह सिर्फ जिद्द है
  • महिला दिवस के पूर्व श्रमिक फाउंडेशन की ओर से कार्यक्रम का आयोजन

श्रमिक फाउंडेशन की ओर से महिला दिवस के पूर्व आयोजित कार्यक्रम में IMA हॉल भरा था। इसमें भारतीय राष्ट्रीय असंगठित मजदूर संघ के कई राष्ट्रीय अधिकारी मौजूद रहे। आयोजन सरकार की योजनाओं और महिलाओं को मिलने वाले लाभ पर केन्द्रित था। आयोजन में भाग लेने वाली पांच महिलाओं से भास्कर ने बात की और आप तक उनके संघर्ष की कहानी लाने की कोशिश की। ये वैसी महिलाएं हैं जो बहुत पढ़ी-लिखी नहीं, लेकिन इनके अंदर एक जिद्द है खुद के साथ-साथ समाज को आगे ले चलने की

पति को लस्सी का ठेला चलाना पड़ा तो लगा वज्र टूट पड़ा है
रीना गुप्ता का मायके खगड़िया है। वे अभी राजेन्द्रनगर पटना में रहती हैं। बताती हैं कि लॉक डाउन के समय बिहारी मजदूरों की स्थिति देखकर उनका मन पसीज गया और उन्होंने महिला श्रमिक केन्द्र खोला। इसके बाद महिला और पुरुष श्रमिकों के लिए इन्टू (भारतीय राष्ट्रीय असंगठित मजदूर संघ) कई लोगों की मदद से बनाया। संगठन इसलिए कि मजदूरों खासकर महिला मजदूरों को सरकार की योजनाओं का सही लाभ दिलाया जा सके। जुलॉजी से ग्रेजुएशन करने वाली रीना बताती हैं कि 94-95 में उनकी सास की तबियत बहुत खराब हो गई। ब्रेन हेमरेज कर गया। पति प्राइवेट नौकरी में थे। पैसे की काफी किल्लत होने लगी। लोगों ने सलाह दी कि अपना ठेला निकालिए, कुछ पैसे हो जाएंगे। पति के लिए ठेला तैयार कर दिया और पति ठेले पर लस्सी बेचने लगे। लेकिन इस स्थिति को देखना काफी दुखद था, लगा वज्र टूट पड़ा है। जिस दिन ठेला निकला उसी दिन से रीना बीमार हो गईं। तीन महीने तक बीमार रहीं। वह कहती हैं कि उस दिन उन्हें एहसास हुआ कि मजदूर का जीवन कितना कठिन है। उसके बाद से प्रण लिया कि असंगठित मजदूरों के लिए काम करेंगी। वह अभी इन्टू की राष्ट्रीय महिला अध्यक्ष हैं।

प्रेम विवाह किया और समस्तीपुर से पटना आ गईं
रश्मि तस्लीम पटना के मुन्नाचक में रहती हैं। वह समस्तीपुर की रहनेवाली हैं। उन्होंने हिंदू धर्म के लड़के से शादी कर ली। शादी करने के बाद पति के साथ पटना चली आईं। पति ड्राइवर हैं। शादी 2015 में हुई। अब तीन साल का बेटा भी है। लेकिन ससुराल और मायके जाना-आना बंद हो गया। अब घरवालों से फोन पर बात होती है। घर वाले चाहते हैं कि हम घर लौट आएं पर हम नहीं लौटे। कहती हैं कि छह साल बहुत मुश्किल से काटे हैं हमने पटना में। जब सहारा की जरूरत थी घर वालों ने सिर्फ नफरत दिया। वह कहती हैं कि कई महिलाएं ऐसी परिस्थितियों में टूट जाती हैं लेकिन मैंने लड़ना सीखा है परिस्थितियों से। बताती हैं कि वह एक होटल में मैनेजर की नौकरी कर रही हैं। परिवारवालों से कहती हैं कि आप सबों से हमें कोई मदद नहीं चाहिए, घर वालों को कोई मदद चाहिए तो हम हमेशा के लिए तैयार हैं। रश्मि ने परिस्थतियों से हार रही महिलाओं के लिए काम करने की ठानी है और उन्हीं के लिए काम कर रही हैं।

सब ने ताने मारे, लेकिन हौसला कम नहीं हुआ
उर्मिला सिंह, अशोक नगर, कंकड़बाग, पटना में रहती हैं। उनकी उम्र 60 साल है। वह अब भी फिट रहती हैं। 90 से महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूह बना रही हैं। सिलाई का प्रशिक्षण भी देती हैं। 90 के दशक में जब घर से बाहर निकलीं और महिलाओं के लिए काम करने की ठानी तो सभी ने खूब मजाक बनाया। बाहर वाले के साथ घर वालों ने भी ताना मारा। अब सभी सम्मान की नजर से देखते हैं। पति विष्णु कुमार की सचिवालय में किताब की दुकान थी। परिवार को आगे बढ़ाने के लिए उर्मिला ने श्रृंगार की दुकान खोली। तीनों बेटों को पढ़ाने के लिए सिलाई की। इसी पैसे से घर बनाया। अब तीनों बेटे नौकरी में हैं। 2019 में पति का निधन हो गया। उर्मिला ने श्रृंगार की दुकान भी बंद कर दी। अब वह अपना पूरा समय महिलाओं को जागरूक करने में दे रही हैं।

500 महिलाओं को समूह से जोड़ स्वाभिमानी बनाया
कंचन देवी, आशोचक पटना की रहनेवाली हैं। पति का निधन हर्ट अटैक से15 अगस्त 2020 को हो गया। वह कोरोना का समय था। वे सेल्समैन थे। वह बताती हैं कि उनके तीन बच्चे हैं। दो बेटा और एक बेटी। पति की असामयिक मृत्यु के पूरा परिवार लड़खड़ा गया। परिवार चलाने के लिए बुटीक खोला, सिलाई भी करती हैं। महिने में 20 हजार रुपए कमा लेती हैं। इसके बाद पटना नगर निगम से जुड़ीं। अब तक 50 स्वयं सहायता समूह बनवा चुकी हैं। सभी समूह से बैंक से लोन भी दिलवाया। स्वयं सहायता समूह की महिलाएं अगरबत्ती, सत्तू, थैला आदि बनाती हैं। बताती हैं कि अब तक 500 महिलाओं को समूह से जोड़ा है। लगभग 10 हजार रुपए महिना कमा कर घर में मदद कर रही है। स्वाभिमान की जिंदगी जी रही हैं।

बच्चों की खातिर घर से निकलीं थी बाहर

लक्ष्मी देवी ब्रह्मपुर, पटना की रहनेवाली हैं। पति सुधा डेयरी में मशीन मैन हैं। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी तो लक्ष्मी ने बिहार राज्य बाल कल्याण परिषद् के स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। लेकिन बड़े भाई ने मना किया कि घर से बाहर महिला को नौकरी नहीं करनी है। लेकिन वह अपने तर्कों के साथ अड़ गईं कि बच्चों का भविष्य कैसे सुधरेगा पैसे के बिना। वह बताती हैं कि स्कूल में पढ़ाने लगीं। बिहार सरकार के संवर्द्धन संस्थान में काम किया। कहती हैं कि अब तक 100 महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जोड़ चुकी हैं। ये महिलाएं अचार, पापड़ का व्यवसाय कर रही हैं। कई सिलाई भी करती हैं। कहती हैं कि सरकार ने महिलाओं के लिए योजना बनाई पर जागरुकता के अभाव में इसका लाभ महिलाएं नहीं उठा पातीं। ऐसी महिलाओं को जानकारी देती हैं।

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