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बिहार विद्यापीठ के आज 100 साल:देश का इकलौता संस्थान जिसने दो भारत रत्न दिए, अब ऐसे रत्न की तलाश जो इसका गौरव लौटा सके

बिहारएक महीने पहलेलेखक: भैरव लाल दास
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राजेन्द्र बाबू का विद्यापीठ से घनिष्ठ संबंध रहा। असहयोग आंदोलन के बाद यहीं से उन्हें गिरफ्तार किया गया। - Dainik Bhaskar
राजेन्द्र बाबू का विद्यापीठ से घनिष्ठ संबंध रहा। असहयोग आंदोलन के बाद यहीं से उन्हें गिरफ्तार किया गया।
  • विद्यापीठ से जुड़े राजेंद्र प्रसाद यहीं से दिल्ली गए फिर यहीं प्राण त्यागे, लोकनायक ने इसे कर्मक्षेत्र बनाया

बिहार विद्यापीठ शनिवार को सौ साल का हो गया। देश का यह इकलौता शिक्षण संस्थान है जहां से जुड़ी दो विभूतियों- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और जय प्रकाश नारायण को भारत रत्न मिला है। राजेन्द्र बाबू का विद्यापीठ से घनिष्ठ संबंध रहा। असहयोग आंदोलन के बाद यहीं से उन्हें गिरफ्तार किया गया। इसी प्रांगण से वे दिल्ली गए और राष्ट्रपति से निवृत्त हुए। यहीं वापस आए। यहीं रहे। यहीं प्राण त्याग किया। विद्यापीठ परिसर में ही राजेन्द्र स्मृति संग्रहालय है, जहां राजेन्द्र बाबू की निजी चीजें संगृहित हैं। जिस कमरे में उन्होंने अंतिम सांस ली, उसे भी बहुत ही करीने से संजो कर रखा गया है। रही बात जेपी की तो पटना विश्वविद्यालय की पढ़ाई छोड़ने के बाद उन्होंने बिहार विद्यापीठ में ही अपना नामांकन कराया। इसके परिसर को ही अपना कर्मक्षेत्र बनाया। आज विद्यापीठ उस कतार में नहीं खड़ा है, जहां गुजरात विद्यापीठ और काशी विद्यापीठ खड़े हैं। ये दोनों बिहार विद्यापीठ के बाद अस्तित्व में आए। सौवें साल में इस विद्यापीठ को अब एक ऐसे रत्न की तलाश है जो इसकी विलुप्त गरिमा को बहाल कर सके।

1921 से 1932 : 11 साल तक यहां परवान पर थीं शैक्षणिक गतिविधियां

महात्मा गांधी, मौलाना मजहरूल हक, ब्रजकिशोर प्रसाद और डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने जिन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए बिहार विद्यापीठ की स्थापना की वह सपना अधूरा है। 1921 से लेकर 1932 तक यहां शैक्षणिक गतिविधियां परवान पर थीं। बच्चे यहां से व्यावहारिक व तकनीकी शिक्षा हासिल करते थे। यही 11 साल इस विद्यापीठ का स्वर्णिम काल था।

असहयोग आंदोलन के दौरान गांधी जी बार-बार कहते थे कि अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था को बदलना निहायत आवश्यक है। उन्होंने शिक्षकों को विद्यालय त्यागने और छात्रों को विद्यालय का बहिष्कार करने का आह्वान किया था। इन्हीं छात्रों की पढ़ाई के लिए गांधी जी ने राष्ट्रीय विद्यालय और इनके प्रबंधन के लिए विद्यापीठ की कल्पना की थी।

मदद मिली तो गुजरात विद्यापीठ से आगे होंगे

बिहार विद्यापीठ का उद्देश्य भारतीय संस्कृति पर आधारित शिक्षा प्रदान करना, देश के लिए स्वयंसेवक तैयार करना और उद्यमिता को विकसित करना था। विद्यापीठ धीरे-धीरे संवर रहा है। आने वाले दिनों में यहां 6 संस्थान होंगे। संस्थान को भारत या बिहार सरकार से मदद मिले तो संस्थान गुजरात व काशी विद्यापीठ से बेहतर बना सकते हैं।

अभी भारत सरकार से मिले चार करोड़ मिले कॉरपस फंड से चल रहा है। आइडिया था कि यहां बच्चे कक्षा-1 से पढ़ना शुरू करें तो विश्वविद्यालय तक की पढ़ाई पूरी कर निकलें। इसीलिए यहां कमला नेहरू शिशु विहार खुला था। अभी इसमें कक्षा 10 तक बच्चे पढ़ते हैं। अब यहां इंटर स्तर पर एग्रीकल्चर की पढ़ाई शुरू करने की योजना है।

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