सम्राट अशोक के शिलालेख पर बनी मजार:रोहतास में 15 सालों में ASI 3 बार लिख चुका लेटर; 1 अक्टूबर को भाजपा का धरना

पटना2 महीने पहले

रोहतास की चंदन पहाड़ी में स्थित महान मौर्य सम्राट अशोक के एक ऐतिहासिक शिलालेख पर मजार बना दिया गया है। पूरे देश में अशोक के ऐसे आठ शिलालेख हैं, जिनमें बिहार में केवल एक ही है। इस शिलालेख पर चूने से पोताई करवा दी गई है। यहां अब चादर चढ़ाई जाती है।

भाजपा अब इस मुद्दे पर महागठबंधन की सरकार को घेरने जा रही है। विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष सम्राट चौधरी ने शिलालेख पर कब्जा कर मजार बनाने के खिलाफ 1 अक्टूबर को जिले में महाधरना देने का ऐलान किया है। सम्राट चौधरी पार्टी के नेतृत्व में स्थानीय नेताओं के साथ विराट प्रदर्शन करेंगे और सरकार से मांग करेंगे कि जल्द से जल्द शिलालेखों को मुक्त करवाया जाए नहीं तो अनिश्चितकालीन प्रदर्शन करेंगे।

चौधरी ने कहा है कि 2300 साल से शिलालेख थे। लेकिन जब से लालू-नीतीश की सरकार बनी, तब से शिलालेखों पर तालाबंदी हो रही है। इन्हीं की शह पर आज दूसरे समूदाय के लोगों ने शिलालेखों पर कब्जा कर तालाबंदी करने का काम किया है। जिसे हम कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे।

नेता प्रतिपक्ष सम्राट चौधरी ने शिलालेख पर कब्जा कर मजार बनाने के खिलाफ 1 अक्टूबर को जिले में महाधरना देने का ऐलान किया है।
नेता प्रतिपक्ष सम्राट चौधरी ने शिलालेख पर कब्जा कर मजार बनाने के खिलाफ 1 अक्टूबर को जिले में महाधरना देने का ऐलान किया है।

क्या है मामला

दरअसल सम्राट अशोक ने रोहतास के मुख्‍यालय सासाराम शहर की पुरानी जीटी रोड और नए बाइपास के मध्य स्थित कैमूर पहाड़ी में शिलालेख उत्कीर्ण कराए थे। ब्राह्मी लिपि में सामाजिक और धार्मिक सौहार्द के संदेश लिखे देश में ऐसे मात्र आठ शिलालेख हैं और बिहार में एकमात्र। फिर भी समाज, सरकार और शासन की नाक के नीचे 2300 साल पुरानी विरासत को मात्र 23 साल में मिटा दिया गया। इस दौरान जिला प्रशासन को 20 पत्र लिख कर बताया गया लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई।

पत्थर पर हरी चादर ओढ़ाकर किन्हीं सूफी संत की मजार घोषित कर दिया गया है।
पत्थर पर हरी चादर ओढ़ाकर किन्हीं सूफी संत की मजार घोषित कर दिया गया है।

15 सालों में 3 बार ASI ने जिला प्रशासन को लिखा लेटर

वर्ष 2008 और 2012 व 2018 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुरोध पर अशोक शिलालेख के पास अतिक्रमण हटाने के लिए तत्कालीन DM ने SDM सासाराम को निर्देशित किया था। तत्कालीन एसडीएम ने मरकजी मोहर्रम कमेटी से मजार की चाबी तत्काल प्रशासन को सौंपने का निर्देश भी दिया, लेकिन कमेटी ने आदेश को नहीं माना। आज यहां बड़ी इमारत बन गई है।

शिलालेख के प्रवेश द्वार पर अब भारी-भरकम लोहे का गेट है, जिसपर बड़ा ताला लगा हुआ है। अब कोई पर्यटक या शोधकर्ता चाहकर भी इस शिलालेख को नहीं देख सकता है। शिलालेख पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है, परंतु प्रवेश द्वार पर लगे गेट पर लगे ताले की चाबी विभाग के पास नहीं है। शिलालेख जिस पहाड़ी पर है वहां चंदन शहीद का मजार भी है। अशोक के शिलालेख को भी मजार बताते हुए इसमें गेट लगाकर ताला बंद किया गया है।

शिलालेख पर लगातार चुने की पुताई की जाती रही है जिससे इसके अस्तित्व पर गहरा संकट हो गया है। पत्थर पर चादर ओढ़ाकर किन्हीं सूफी संत की मजार घोषित कर दिया गया है। सालाना उर्स का भी आयोजन हो रहा है। जाने-अनजाने यहां हिंदू-मुस्लिम दोनों धर्म के लोग मत्था टेकने आने लगे हैं।

उस कालखंड में आमजन की लिपि ब्रह्मी थी, इस कारण संदेश इसी लिपि में उत्‍कीर्ण करवाए, ताकि अधिक से अधिक लोग इन्हें पढ़कर आत्मसात कर सकें।
उस कालखंड में आमजन की लिपि ब्रह्मी थी, इस कारण संदेश इसी लिपि में उत्‍कीर्ण करवाए, ताकि अधिक से अधिक लोग इन्हें पढ़कर आत्मसात कर सकें।

गुफा में स्थित है शिलालेख, वर्ष 1917 में किया गया था संरक्षित

ASI के अधीक्षक गौतमी भट्टाचार्य ने बताया कि सम्राट अशोक के इस महत्वपूर्ण लघु शिलालेख को ब्रिटिश राज में वर्ष 1917 में संरक्षित किया गया था। इसे प्रारंभिक नोटिफिकेशन (संख्या: बीओ 01332 ईई, 14 सितंबर 1917) तथा अंतिम नोटिफिकेशन (संख्या: बीओ 1814 ईई एक दिसंबर 1917) के जरिए अधिग्रहित किया गया था। स्वतंत्रता के बाद ASI ने इस शिलालेख को वर्ष 2008 में संरक्षित स्मारक के रूप में अधिसूचित किया।

कैमूर पहाड़ी पर चंदन शहीद मजार से लगभग 20 फीट नीचे पश्चिम दिशा में 10 फीट लंबा एवं 4 फीट चौड़े गुफा में यह लघु शिलालेख है। लंबे समय तक यह शिलालेख के प्रवेश द्वार पर कोई गेट नहीं था। पुरात्तव विभाग द्वारा संरक्षण के बाद यहां एक बोर्ड भी विभाग द्वारा लगाया गया था। परंतु बताते है कि कुछ दशक पहले यहां से बोर्ड उखाड़ कर फेंक दिया गया। फिर यहां ग्रिल लगाया गया, तब ग्रिल में से इस शिलालेख को देखा जा सकता था। लेकिन फिर ग्रिल की जगी लोहे का दरवाजा लगा दिया गया, जिससे अब शिलालेख कोई नहीं देख पाता। एक बार फिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने संरक्षित स्मारक के रूप में अधिसूचित करने के लिए केंद्र सरकार को अनुशंसा भेजी है।

शिलालेख जिस पहाड़ी पर है वहां चंदन शहीद का मजार भी है। सम्राट अशोक के शिलालेख को भी मजार बताते हुए इसमें गेट लगाकर ताला बंद किया गया है।
शिलालेख जिस पहाड़ी पर है वहां चंदन शहीद का मजार भी है। सम्राट अशोक के शिलालेख को भी मजार बताते हुए इसमें गेट लगाकर ताला बंद किया गया है।

सद्भाव का संदेश देता है शिलालेख

इतिहासकार डा. श्याम सुंदर तिवारी बताते हैं कि ईसा पूर्व 256 ई. में देश भर में आठ स्थानों पर तीसरे मौर्य सम्राट अशोक ने लघु शिलालेख लगवाए थे। इनमें से एक सासाराम की चंदन पहाड़ी पर है, जहां अब मजार बना दिया गया है। बताया कि कलिंग विजय के युद्ध में हुए रक्तपात से विचलित होकर बुद्ध की शरण में आए सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के संदेशों के प्रचार-प्रसार के लिए जगह-जगह ऐसे शिलालेख खुदवाए थे। उस कालखंड में आमजन की लिपि ब्रह्मी थी, इस कारण संदेश इसी लिपि में उत्‍कीर्ण करवाए, ताकि अधिक से अधिक लोग इन्हें पढ़कर आत्मसात कर सकें।

इस शिलालेख की खोज 19वीं सदी के अंत में अंग्रेज पुरात्तवेता द्वारा किया गया था। इस पर लिखा गया है - "एलेन च अंतलेन जंबूदीपसि"। इसका अर्थ है कि जंबू दीप में सभी धर्मों के लोग सहिष्णुता से रहें।

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