छठ महापर्व का इतिहास 1700 साल पुराना:गुप्तकाल से प्रचलित है छठी मैया की पूजा; छठी मैया के रूप में स्कंद माता की होती पूजा

पटना3 महीने पहले

छठ व्रत हिंदुओं का अत्यंत महत्वपूर्ण त्योहार है। इस महापर्व पर भगवान भास्कर और छठी मैया की पूजा-अर्चना होती है। सूर्य की उपासना का यह सबसे महत्वपूर्ण पर्व है। प्रत्येक मास की सप्तमी तिथि विशेषकर शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि सूर्य भगवान की तिथि मानी जाती है और इस दिन इनकी उपासना का विधान है।

इसके साथ ही कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि सबसे पावन तिथि मानी जाती है। इसी कारण सूर्य भगवान की पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष में सप्तमी के दिन उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर पूजा की जाती है।

छठी मैया वास्तव में हैं पार्वती माता
यह चार दिनों का व्रत होता है: नहाए खाए, खरना, अस्तगामी सूरज और उदीयमान सूरज को अर्घ्य देकर उनकी पूजा की जाती है। भास्कर से बातचीत में आचार्य किशोर कुणाल ने कहा कि यह तथ्य तो सभी लोगों को पता है, लेकिन छठी मैया की जो पूजा होती है, उसमें छठी मैया कौन देवी हैं, इसका ज्ञान बहुत से लोगों को नहीं है। इसमें मैंने बहुत अनुसंधान किया तो पाया कि छठी मैया वास्तव में स्कंदमाता (पार्वती जी) हैं। जैसे सप्तमी तिथि सूर्य भगवान की उपासना की तिथि है, वैसे षष्ठी तिथि स्कंद यानी की कार्तिकेय भगवान की पूजा की तिथि है।

षष्ठी तिथि को हुआ था भगवान कार्तिकेय का जन्म
उन्होंने बताया कि कार्तिकेय का जन्म षष्ठी तिथि को हुआ था और षष्ठी तिथि को ही वह देवताओं के सेनापति बनाए गए थे। इसलिए षष्ठी तिथि उनके जीवन में सबसे महत्वपूर्ण है। नवरात्रि में दुर्गा पूजा में 9 दिनों का विधान होता है और प्रत्येक दिन दुर्गा जी के एक रूप की पूजा-अर्चना होती है। पांचवें दिन स्कंदमाता के रूप में दुर्गाजी की पूजा होती है। इस प्रकार स्कंदमाता के रूप में पार्वती जी की पूजा सदियों से होती आई है।

छठी मैया वास्तव में स्कंदमाता (पार्वती जी) हैं।
छठी मैया वास्तव में स्कंदमाता (पार्वती जी) हैं।

पिछले 700 वर्षों से इसी तरह मनाया जा रहा छठ
छठ पर्व के विधान का जिक्र मिथिला के प्रसिद्ध निबंधकार चंडेश्वर ने 1300 ईसवी में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक कृत्य रत्नाकर में किया है। उसके बाद मिथिला के दूसरे बड़े निबंधकार रूद्रधर ने 15वीं शताब्दी में कृत्य ग्रंथ में चार दिवसीय छठ पर्व का विधान विस्तृत रूप से दिया है। यह वर्णन ऐसा ही है जैसा आज हम लोग छठ पर्व मनाते हैं।

1300 ईसवी के पहले चंदेश्वर ने छठ व्रत के ऊपर प्रकाश डाला। 1285 ईसवी में हेमाद्री ने चतुवर्ग चिंतामणि ग्रंथ में और 1130 ईसवी के आसपास लक्ष्मीधर ने कृत्य कल्पतरू में सूर्योपासना एवं षष्ठी व्रत का विधान बताया है। लक्ष्मीधर गहड़वाल वंश के प्रसिद्ध शासक गोविंद चंद्र के प्रमुख मंत्री और सेनापति थे।

किशोर कुणाल की मानें तो 1700 साल पहले से छठ पूजा का वर्णन मिलता है।
किशोर कुणाल की मानें तो 1700 साल पहले से छठ पूजा का वर्णन मिलता है।

गुप्तकाल में भी होती थी छठी मैया की पूजा
किशोर कुणाल बताते हैं कि गहन अध्ययन के बाद यह पता चलता है कि गुप्तकालीन जो सिक्के मिले हैं, उनमें षष्ठीदत्त नाम का सिक्का भी मिलता है। पाणिनी ने जो नामकरण की प्रक्रिया बताई है, उसके अनुसार देवदत्त, ब्रह्मदत्त और षष्ठीदत्त इन शब्दों का अर्थ इस प्रकार लगाया जाता है: देवदत्त का मतलब देवता के आशीर्वाद से जन्म होना, ब्रह्मदत्त का मतलब ब्रह्मा के आशीर्वाद से और षष्ठी देवी के आशीर्वाद से जन्मे हुए पुत्र षष्ठीदत हुए। इस प्रकार पिछले 1700 वर्षों से यह विवरण मिलता है, जिसके अनुसार आज का छठ व्रत मनाया जाता है।

गुप्त काल में षष्ठीदत नाम का प्रचलन था। इससे प्रमाणित होता है कि छठी मैया की पूजा उस समय भी होती थी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध इतिहास को वासुदेव शरण अग्रवाल ने अपनी पुस्तक पाणिनिकालीन भारतवर्ष में बताया है।

संतान प्राप्त करने के लिए भी होती है छठी मैया की पूजा
यह षष्ठीदेवी अनेक पुराणों में ऐसी देवी मानी गई हैं, जो बच्चों की रक्षा करती हैं और उन्हें लम्बी आयु देती हैं। इसलिए इनकी पूजा का विधान है और आज भी बहुत से परिवारों में संतान प्राप्त करने के लिए भी छठी मैया की पूजा की जाती है।

छठ में आखिर 2 देवताओं की पूजा क्यों?
प्रश्न यह उठता है कि छठ के अवसर पर 2 देवताओं की पूजा क्यों की जाती है। इस पर किशोर कुणाल कहते हैं कि इसका सही उत्तर यह होगा कि जैसे दिवाली में 2 देवताओं की पूजा का विधान है, वैसे ही षष्ठी तिथि में स्कंद (कार्तिकेय भगवान) की पूजा और सप्तमी तिथि में सूर्य भगवान की पूजा की जाती है।

पाकिस्तान के सूर्य मंदिर को मोहम्मद गजनवी ने तोड़ा
सूर्य भगवान की पूजा वैदिक काल से ही देश में प्रचलित है। सूर्य भगवान के मंदिर इस देश के बाहर भी बहुत सारे स्थानों पर बने हुए थे। जिसमें मुल्तान (पाकिस्तान) का भव्य सूर्य मंदिर भी है, जिसका वर्णन अलबरूनी ने किया है। इस मंदिर को मोहम्मद गजनवी ने तोड़ा था।

इसी प्रकार काबुल के पास खैर कन्हेर में सूर्य भगवान का प्रसिद्ध मंदिर था, जिसे मोहम्मद गजनवी ने तोड़ा था। किंतु 1936 में खुदाई हुई तो इसमें बहुत सारे देवताओं की मूर्तियां साबूत पाई गई हैं। इसमें सूर्य भगवान की भव्य मूर्ति है, जो अभी काबुल के म्यूजियम में सुरक्षित है। यह मूर्ति 700 ईसवी की है।