पटना में तीन पुस्तकों का लोकार्पण:प्रो. पुष्पेन्द्र ने कहा- ये पुस्तकें बिहार की अभिव्यक्ति, जीवन संघर्ष और उनकी आकांक्षाओं को सामने लाने में उपयोगी

पटना3 महीने पहले
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जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल रिसर्च की ओर से तीन पुस्तकों का लोकार्पण शनिवार को किया गया। युवा छात्रावास, फ्रेजर रोड के सेमिनार हॉल में यह आयोजन हुआ। रंगकर्मी हसन इमाम लिखित पुस्तक 'बिहार के लोकगीतों में प्रतिरोधी चेतना' डॉ आशुतोष कुमार विशाल लिखित 'एग्रीकल्चर वोमेन लेबर इन बिहार' और 'भुइया ऑफ बिहार' का लोकार्पण टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज पटना केंद्र के चेयर पर्सन प्रोफेसर पुष्पेंद्र ने किया।

शोध अध्ययन की निरंतरता बनाए रखें
इस अवसर पर प्रोफेसर पुष्पेंद्र ने कहा कि ये पुस्तकें बिहार की अभिव्यक्ति, जीवन संघर्ष और उनकी आकांक्षाओं को सामने लाने में काफी उपयोगी साबित होंगी। उन्होंने जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल रिसर्च के निदेशक जोश कलापुरा को शोध अध्ययन की निरंतरता बनाए रखने के लिए बधाई दी। लेखक डॉ. आशुतोष कुमार विशाल ने कहा कि पुस्तक बिहार के दलित खेतिहर महिला मजदूरों के सामने बाजार केंद्रित और मशीन केंद्रित खेती के दौर में उत्पन्न समस्याओं और चुनौतियों को सामने लाती है। अपनी दूसरी पुस्तक 'भुइयां ऑफ बिहार' के बारे में उन्होंने कहा कि भूइयां जाति पर केंद्रित यह पुस्तक अविलंब भूमि सुधार विकास कार्यक्रम और जाति व्यवस्था जैसे सवालों को केंद्र में लाता है।

बिहार के लोकगीतो में मेहनतकश लोगों के सपने, यथार्थ और संघर्ष के लय- धुन भी
'बिहार के लोकगीतों में प्रतिरोधी चेतना' पुस्तक पर बोलते हुए इसके लेखक हसन इमाम ने कहा कि बिहार के लोकगीतों में मेहनतकश आवाम के जीवन के सपने, यथार्थ और संघर्ष के लय,धुन और बोल दर्ज हैं। इनमें ना केवल हर्ष और उल्लास दर्ज है बल्कि जीवन और समाज की विसंगतियों के खिलाफ प्रतिरोध भी है, लेकिन आज शासकीय विचार से संचालित बाजारवादी संस्कृति ने लोकगीतों को अश्लील और फूहड़ बना दिया है।

महिला द्वारा घर में काम करने को श्रम नहीं मानना अफसोसजनक

पुस्तक पर अपनी बात रखते हुए मीरा दत्त ने कहा कि महिला खेतिहर मजदूरों पर शोध अध्ययन एक सराहनीय और महत्वपूर्ण काम है। पुस्तक में दर्ज आंकड़ों के माध्यम से खेतिहर महिला मजदूरों के जीवन के हर पक्ष को सामने लाया गया है। उन्होंने कहा कि घर से बाहर काम करने वाली महिलाओं को तो श्रमिक माना जाता है लेकिन घर में उनके द्वारा किए जाने वाले कार्यों को श्रम के रूप में स्वीकार नहीं किया जाता है। यह अफसोस जनक है। कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल रिसर्च के उप निदेशक फादर जोसेफ पुलिक्काल ने किया।

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