आज सुशांत सिंह राजपूत की बर्थ एनिवर्सरी:फैंस को लगता था सुशांत ही नेपोटिज्म, करण जौहर और खान बंधुओं को चुनौती दे सकते थे

पटना4 महीने पहलेलेखक: प्रणय प्रियंवद
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आज पटना के सुशांत सिंह राजपूत की बर्थ एनिवर्सरी है। पूरे देश के लोगों को सुशांत याद आ रहे हैं। लेकिन, बिहार के लोगों का दर्द सबसे बड़ा है। वे महज 35 साल के थे जब 14 जून 2020 को दुनिया छोड़ गए। 19 अगस्त 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने सुशांत केस की जांच CBI को सौंप दी। सुशांत का जन्म 21 जनवरी 1986 को पटना में हुआ था। पटना के सेंट कैरेंस स्कूल से उन्होंने पढ़ाई की। 35 साल की उम्र में ही सुशांत ने बता दिया था कि सपनों की उड़ान के मायने क्या होते हैं। यह कहानी उस युवा की है जो चांद-सितारों को दूरबीन से देखने का शौकीन था सितारों की दुनिया में अपनी धमक उन्होंने दिखाई। चांद की जमीन उन्हें खींचती थी।

अंतिम फिल्म थी 'दिल बेचारा'
सुशांत एक मेधावी स्टूडेंट से डांसर और फिर बॉलीवुड की दुनिया के स्टार बन गए। पवित्र रिश्ता सीरियल में मानव की भूमिका से वे हर किसी के दिलों में छा गए। फिल्मों में तो बाद में आए। उनके चाहने वाले कहते हैं सुशांत एक साथ डांसर, साइंटिस्ट और फिलॉस्फर थे। सुशांत ने फिल्म 'काय पो छे' से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की, जिसके बाद उन्हें एक स्टार के रूप सभी दर्शकों ने अपना लिया। सुशांत की फिल्म 'छिछोरे' को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का 67वां राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। उनकी फिल्म एमएस धोनी, द अनटोल्ड स्टोरी ने तो तहलका मचा दिया था। इसके बाद पीके और केदारनाथ, छिछोरे आई। उनकी आखिरी फिल्म 'दिल बेचारा है' थी।

बदनाम नेपोटिज्म को ध्वस्त कर आगे बढ़े थे सुशांत- विनोद अनुपम
फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि सुशांत के साथ दो-तीन बातें खास हैं। बिहार का युवा लड़का था अपनी प्रतिभा के साथ खुद और बिहार की पहचान बनाई थी। उनकी सफलता ने खासकर मध्य वर्गीय युवाओं के मन में उम्मीद जगाई कि इतने सितारों के बीच जगह बना सकते हैं। जहां तक अभिनय की बात है उन्होंने अपने लिए जैसी भूमिका चुनी थी वह बेजोड़ थी। भूमिकाओं के चयन में वे बहुत सजग दिखे। फिल्म में धोनी की भूमिका का चयन काबिल-ए-तारीफ था। कम समय में उन्होंने मुकाम हासिल किया।

उनमें अपार संभावनाएं थीं। खासकर बॉलीवुड में जिस नेपोटिज्म की बात होती है सुशांत, करण जौहर और खान बंधुओं को चुनौती दे सकते थे। उनके पक्ष में लोग खड़े हुए। चमक दमक वाली दुनिया में अपने स्वभाव, प्रतिभा से उन्होंने जगह बनाई। जो बॉलीवुड नेपोटिज्म के बदनाम है उसमें बाहरी लोगों, प्रतिभाशाली युवाओं के लिए जगह बनाई। इस नजरिए से देखें तो उनकी मौत को शहादत के रूप में देख सकते हैं। नेपोटिज्म से लड़ने में सरकार भी डरती थी। लेकिन, अब देखें तो सरकार इसको तोड़ रही है। उनकी मौत के बाद कंगना जिस तरह से मुखर हुई उससे बॉलीवुड में दो धारा बन गई। सुशांत की शहादत की सहूलियत बाद वाली पीढ़ी को मिल रही है।

फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम।
फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम।

बर्थ डे पर उनका डांस सबसे ज्यादा याद आ रहा है - दिव्या गौतम
सुशांत की ममेरी बहन दिव्या गौतम उन्हें याद करते हुए कहती हैं कि मेरा जन्मदिन 17 को और उनका 21 को पड़ता है। उनको कैसे याद करें। मुझे याद है कि वे अपने जन्म पर या किसी अन्य का जन्म दिन हो उसमें डांस जरूर करते थे और डांस को देखना काफी दिलचस्प होता था। वे जो भी करते डूब के करते। धुन के पक्के की तरह। पढ़ाई में उनकी खूब इंटरेस्ट था। वे हमें मैथ्स, फिजिक्स पढ़ाते थे। हम लोगों की साइंस इम्प्रूव कराने में उनका बड़ा योगदान रहा।

सुशांत की ममेरी बहन दिव्या गौतम।
सुशांत की ममेरी बहन दिव्या गौतम।