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बिहार विधानसभा चुनाव:इस बार केंद्र में आई बेरोजगारी, क्या युवा तय करेंगे चुनाव के नतीजे?; 2019 के लोस चुनाव में बड़ा मुद्दा बनी थी बेराेजगारी

बिहारएक महीने पहले
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बिहार चुनाव से संबंधित आंकड़े।
  • सीएसडीएस-लोकनीति के ताजा सर्वे में राज्य सरकार और नीतीश से नाखुश हैं नौजवान
  • व्यापक नाराजगी के बावजूद युवा एकजुट होकर निर्णायक ढंग से तेजस्वी के साथ नहीं

2020 के बिहार के चुनावी परिदृश्य को देखें। नौजवान तेजस्वी यादव राजद-कांग्रेस के साथ वामदलों के गठबंधन को फ्रंट से लीड कर रहे हैं। उनकी सभाओं में भीड़ भी उमड़ रही है और वह नीतीश कुमार जैसे मजे हुए नेता को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। दूसरे नौजवान चिराग पासवान अकेले ही नीतीश को चुनौती दे रहे हैं और उन्होंने उनके खिलाफ खुली लड़ाई छेड़ रखी है।

कन्हैया कुमार को भी नहीं भूलना चाहिए जो 2019 का लोकसभा चुनाव लड़े और हार गए, लेकिन वह भी राज्य की वाम राजनीति के नौजवान चेहरा हैं। पुष्पम प्रिया चौधरी ने तो प्लूरल्स पार्टी ही बनाई और नीतीश को खुली चुनौती दी।

यह उभार इसलिए कि नौजवान सरकार और नीतीश से नाखुश हैं। सीएसडीएस-लोकनीति का ताजा सर्वे भी इसे प्रमाणित करता है और इसकी वजह है कि बीते 15 साल के शासन में सरकार ने नौकरी या रोजगार के अवसर अपेक्षा के अनुरूप सृजित नहीं किए। तो क्या इसका मतलब है कि 2020 का चुनाव परिणाम युवा तय करेंगे और यह भी सुनिश्चित करेंगे कि सूबे का अगला सीएम कौन होगा? या युवा इसलिए नाराज हैं कि उन्होंने बतौर सीएम सिर्फ नीतीश का ही चेहरा देखा है और उन्हें कोई आइडिया नहीं है कि नीतीश से पहले सूबे की सूरत कैसी थी? नीतीश 2005 से राज्य के सीएम हैं।

यह सच है कि युवाओं ने नीतीश को ही शासन करते देखा है और उनके जेहन में कोई शासन व्यवस्था दर्ज नहीं है। रही बात बेरोजगारी की तो बिहार में यह सवाल कोई बीते 5 साल में पैदा नहीं हुआ। यह सवाल वर्षों से जहां है, वहीं बना हुआ है। कभी यह सवाल चुनाव का मुद्दा नहीं रहा। इस चुनाव में फर्क यह है कि बेरोजगारी का सवाल केंद्र में आ गया है। 2019 के लोकसभा चुनाव में देश के 19% (18-25 वर्ष) युवाओं ने बेरोजगारी को सबसे बड़ा मुद्दा बताया था। तब बिहार के 29% युवाओं ने कहा था कि उनके लिए बेरोजगारी का सवाल पहला सवाल है।

26-35 आयु वर्ग के 27% बिहारी नौजवानों ने भी बेरोजगारी पर ही बात की थी जबकि देश में इस आयु वर्ग का औसत 14% ही था। सर्वे से मिले साक्ष्य संकेत दे रहे थे कि बेरोजगारी आखिर क्यों चुनाव में इतना बड़ा मुद्दा बन गया है, जिसके आगे सारे मुद्दे लगभग गौण नजर आ रहे हैं और युवा नीतीश के खिलाफ खड़े हो गए हैं। यहां बता दें कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में बिहार में स्नातक पास छात्रों की संख्या अधिक है। युवा सिर्फ नौकरी को लेकर नाराज नहीं है, उनके भीतर यह घर कर गया है कि सरकार उनकी समस्याओं की ओर ध्यान ही नहीं देती।

इतिहास में लौटें तो साफ हो जाता है कि युवाओं ने ही कई बड़े राजनीतिक परिवर्तन किए हैं। 1975 का जेपी आंदोलन युवाओं की ही देन थी। 1980 का आसाम मूवमेंट युवाओं की ही देन थी। वीपी सिंह की 1989 की भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को युवाओं का ही समर्थन था। 1990 में मंडल मूवमेंट, जिसने बिहार, यूपी जैसे हिंदी पट्‌टी के राज्यों की राजनीति पलट दी, के नायक भी युवा ही थे। अन्ना हजारे के मूवमेंट को युवाओं ने ही हवा दी। इन आंदोलनों ने राज्यों ही नहीं देश की राजनीति में व्यापक उलट-पलट की है।

इस परिप्रेक्ष्य में बिहार के युवाओं की क्षमता को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। कुल मतदाताओं में 18-25 वर्ष के युवाओं की संख्या एक-चौथाई है और 26-35 साल के युवा वोटरों की संख्या 26% है। युवा वोटरों की यह संख्या सिर्फ बिहार में ही नहीं है, ऐसा कई राज्यों में है लेकिन बिहार में यह राष्ट्रीय औसत से अधिक है। इन तथ्यों और तर्कों का यह कतई आशय नहीं कि बिहार में कोई यूथ मूवमेंट पनप रहा है। लेकिन इतना तो जरूर है कि बिहार का नौजवान नाराज है। लेकिन अनुभव बताता है कि नाराज होने के बावजूद युवाओं ने कभी मुट्‌ठीबंद होकर वोट नहीं किया। उनका वोट पार्टियों में बंटता रहा है।

बिहार में भी यही स्थिति है, राजग से नाराज युवाओं का वोट राजद, रालोसपा, निर्दलीय या किसी अन्य दलों में बंटता दिख रहा है। यदि ये नाराज युवा तेजस्वी के पीछे लामबंद होते तो यह चुनाव नीतीश कुमार के लिए और कठिन होता। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि 2019 में भारी संख्या में युवाओं ने राजग को वोट दिया था। राजग जीतता है या हारता है, लेकिन यह सत्य है कि बिहार में राजग से युवाओं की नाराजगी गठबंधन के घटक दलों और खासकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लिए चिंताजनक है।

चिंता तेजस्वी यादव के लिए भी है कि इतनी व्यापक नाराजगी के बावजूद युवा एकजुट होकर निर्णायक ढंग से उनके साथ क्यों नहीं हैं? चिराग पासवान लोकप्रिय दिखते हैं, लेकिन युवाओं का थोक वोट उनकी पार्टी को मिलता नहीं दिखता। फिर भी अकेले लड़ते हुए चिराग क्या खुद को भविष्य के नौजवान नेता के रूप में पेश कर रहे हैं? यही सवाल पुष्पम प्रिया चौधरी के लिए भी है। अपनी पार्टी के साथ वह कितनी दूरी तय कर पाती हैं, या फिर वह स्थापित दलों में इंट्री लेने के लिए इस चुनाव को लॉन्चिंग पैड के रूप में इस्तेमाल कर रहीं हैं, यह देखना होगा। इन सवालों का जवाब चुनाव बाद मिलेगा। (यह लेखक के निजी विचार हैं)

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