• Hindi News
  • Local
  • Bihar
  • Upendra Kushwaha News Update : Nitish Kumar And His Old Friend Upendra Kushwaha Can Meet Again

दो ध्रुव बने लव-कुश होंगे साथ:नीतीश कुमार और कुशवाहा की एक मुलाकात के मायने समझिए, कैसे बिछड़े, क्यों मिले अब

पटनाएक वर्ष पहलेलेखक: बृजम पांडेय
  • कॉपी लिंक
तस्वीर पुरानी है, नीतीश-कुशवाहा की दोस्ती की कहानी भी पुरानी है, बस एक ट्विस्ट नया है। - Dainik Bhaskar
तस्वीर पुरानी है, नीतीश-कुशवाहा की दोस्ती की कहानी भी पुरानी है, बस एक ट्विस्ट नया है।
  • उपेंद्र कुशवाहा-नीतीश कुमार के मिलने की चर्चाएं तेज हैं
  • इस मेल से किसका-कितना होगा फायदा-नुकसान

कहते हैं, क्रिकेट में कब क्या हो जाए कोई नहीं जानता। लेकिन सियासत में भी कब किसके पक्ष में कौन चला जाए यह भी कोई नहीं जानता। बिहार की सियासत में पिछले 15 साल से एक धुरी पर टिके नीतीश कुमार अपने विरोधियों को लगातार पटखनी देते रहे हैं। इस बीच में उनके कई साथी आए और चले गए। कई साथी ही दुश्मन बन गए और विपक्ष में चले गए। ऐसे ही हैं उपेंद्र कुशवाहा। उपेंद्र कुशवाहा को पहली दफा नीतीश कुमार ने ही विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया था। बाद में महत्वाकांक्षा ने उपेंद्र कुशवाहा को न सिर्फ नीतीश कुमार से अलग किया बल्कि दुश्मन भी बना दिया। लेकिन अब दोनों एक बार फिर नजदीक आने लगे हैं।

कभी नीतीश कुमार के उत्तराधिकारी माने जाने वाले उपेंद्र कुशवाहा ने पहली बार इस तरह का कदम नहीं उठाया है। कुशवाहा शुरू से ही एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति रहे हैं। उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा में कई बार अपने आपको मेनस्ट्रीम राजनीति से अलग कर लिया।

हमेशा से खुद को राजनीति का केंद्र बिंदु बनाना चाहते थे कुशवाहा

1960 में जन्मे उपेंद्र कुशवाहा का राजनीतिक कैरियर वैशाली के समता कॉलेज में राजनीति शास्त्र के लेक्चरर के रूप में ही शुरू होती है। 1985 में लोक दल में प्रदेश महासचिव बने। 1993 में लोक दल के राष्ट्रीय महासचिव बन जाते हैं। कुशवाहा लगातार अपने आपको राजनीति का केंद्र बिंदु बनाना चाहते थे, लेकिन सफल नहीं हो पा रहे थे। समता पार्टी के टिकट पर 1995 में जब जंदाहा से चुनाव लड़े तो बुरी तरह से हार गए। फिर 2000 में जंदाहा से ही विधायक बने। यहीं से उपेंद्र कुशवाहा का राजनीतिक ग्राफ आगे बढ़ने लगा।

2004 में जब सुशील मोदी भागलपुर से सांसद चुने गए तो विपक्ष की कुर्सी खाली हुई। वहां नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को बैठा दिया। उपेंद्र कुशवाहा एक साल तक विपक्ष के नेता रहे। लेकिन 2005 में दलसिंहसराय से चुनाव हार जाने के बाद जदयू छोड़ दिया। 2008 में एनसीपी का दामन थाम लिया। लेकिन केंद्र बिंदु में रहने की चाहत रखने वाले उपेंद्र कुशवाहा एनसीपी में सरवाइव नहीं कर पाए। फिर उन्होंने सीएम नीतीश कुमार से समझौता कर लिया। नीतीश ने 2010 में उन्हें जदयू के टिकट से राज्यसभा भेज दिया।

2012 में हुआ जदयू से अलगाव

जदयू के सांसद बनने के बाद 2012 में उपेंद्र कुशवाहा ने एक बार फिर पार्टी से अलग लाइन ले लिया। एफडीआई बिल पर अलग वोट किया जिससे नीतीश नाराज हो गए। पार्टी में रहते हुए ही कुशवाहा ने नीतीश कुमार को तानाशाह तक कह डाला। फिर राजगीर में हो रहे जदयू के कार्यकर्ता सम्मेलन की भरी सभा में उपेंद्र कुशवाहा ने नीतीश कुमार के सामने इस्तीफा देने का प्रस्ताव रख दिया। बाद में पार्टी और राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा भी दे दिया।

2013 में उपेंद्र कुशवाहा ने अरुण कुमार के साथ मिलकर आरएलएसपी नाम की एक नई पार्टी बनाई। उस समय नरेंद्र मोदी का उदय हो रहा था। भाजपा ने उपेंद्र को प्रमोट किया और वो एनडीए में शामिल हो गए। 2014 में आरएलएसपी ने 3 सीटों पर लोकसभा का चुनाव लड़ा और तीनों जीत ली। उपेंद्र कुशवाहा केंद्र में राज्यमंत्री बनाए गए। इसी बीच 2015 में जब विधानसभा का चुनाव हुआ तो एनडीए ने इन्हें विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए 23 सीटें दी, जिसमें वह मात्र 2 पर जीत हासिल कर पाए।

2018 में एनडीए भी छोड़ दिए कुशवाहा

2018 आते-आते उपेंद्र कुशवाहा एनडीए में कंफर्टेबल नहीं रह गए। उन्होंने केंद्र के राज्यमंत्री से इस्तीफा दे दिया और यूपीए में शामिल हो गए। महागठबंधन में शामिल होते ही उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि केंद्र की सरकार जनता की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतरी, इसलिए उन्होंने इस्तीफा दिया। उसी समय उनके जहानाबाद के सांसद और आरएलएसपी के प्रदेश अध्यक्ष अरुण कुमार ने पार्टी से अपने आपको अलग कर लिया और अलग पार्टी बनाई आरएलएसपी सेक्यूलर। साथ ही उपेंद्र कुशवाहा को एक और झटका तब लगा, जब इनके पार्टी के दो विधायक जदयू में शामिल हो गए और विधानसभा में इनकी पार्टी का विलय जदयू के साथ हो गया।

लव-कुश मिलेंगे तो जदयू को होगा फायदा

महागठबंधन में रहने के साथ उपेंद्र कुशवाहा ने 2019 का लोकसभा चुनाव दो जगहों से लड़ा, लेकिन दोनों जगह से हार गए। 2020 के विधानसभा में भी उनकी करारी हार हुई है। एक भी सीट नहीं जीत पाए। वहीं, सीएम नीतीश कुमार ने लव-कुश समीकरण के सहारे खुद को सत्ता के करीब रखा है। लेकिन इस समीकरण में लव को जबरदस्त फायदा मिला तो कुश में नाराजगी दिखी। बिहार में कुर्मी समाज की आबादी 4 फीसदी के करीब है। ये अवधिया, समसवार, जसवार जैसी कई उप जातियों में विभाजित हैं। नीतीश कुमार अवधिया हैं, जो संख्या में सबसे कम है, लेकिन नीतीश काल में सबसे ज्यादा फायदा पाने वाली जाति है। कुशवाहा बिरादरी का 4.5 फीसदी वोट है। ऐसे में दोनों मिल जाते हैं तो नीतीश कुमार और खासकर जदयू को इसका फायदा मिलेगा।

खबरें और भी हैं...