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  • The Brave Sons Of Koilwar Had A Glorious History In The August Revolution Of 1942, But The Area Is Still Completely Neglected By Development.

ग्रामीणों की मांग:1942 की अगस्त क्रांति में कोईलवर के वीर सपूतों का गौरवशाली इतिहास रहा, लेकिन इलाका अब भी है विकास से पूरी तरह उपेक्षित

आरा2 महीने पहले
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  • कोईलवर में शहीद कपिलदेव के नाम पर सिक्सलेन पुल के एक लेन का नाम रखने की बात कही है

गांधी जी के आह्वान पर 1942 की अगस्त क्रांति में कोईलवर के वीर सपूतों का योगदान कम नहीं है। जिन्होंने अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत को खुली चुनौती देते हुए अंग्रेज सिपाहियों को दाँत खट्टे कर दिए थे। और हंसते हंसते भारत की आजादी के लिये शहीद हो गए।

लेकिन उनकी इस वीरता को सरकार, प्रशासनिक महकमा भूल गया है। लोग कहते है कि सरकारी अधिकारी के साथ सांसद, विधायक को भी शहीदों के प्रति कोई चिंता नहीं है। चांदी के वीरेंद्र कुमार बताते है कि सूर्यदेव कुमार उनके दादा थे। जो अंग्रेजों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। 8 अगस्त1942 को अंग्रेज अपने ठिकाने बहियारा हाता से आरा जा रहे थे।

जिन्हें सूर्यदेव कुमार ने ललकारते हुए उनका रास्ता रोक भारत माता की जय के गगन गगन भेदी नारे लगाये और तिरंगा लहराया। जिसके बाद अंग्रेज सिपाहियों ने गोली चला दी। जिससे सूर्यदेव शहीद हो गए थे।

अंग्रेजों की तीन गोलियां खाकर भी तिरंगे को नीचे झुकने नहीं दिया था
नरवीरपुर शहीद मिठू महतो के परिजन बाल गोविंद ने बताया कि अगस्त क्रांति के दौरान उन्हें(मिठू महतो) अंग्रेजों ने तीन गोलियों मारी थी। जिसके बाद भी तिरंगे को नीचे नहीं गिरने दिया। इनके साथ 14 अगस्त 1942 को कोईलवर के कपिलदेव रेल लाइन को उखाड़ने के प्रयास में अंग्रेज टॉमी के गोलियों को शिकार हुए थे।

अंतिम सांस तक वीर सपूत कपिलदेव ने भारत माता की जय के नारे लगाते रहे। वहीं धन्डीहा के जयराम सिंह, बिंदेश्वरी सिंह, भोला पांडेय, विपत मल्लाह, यमुना सिंह, चांदी भी अगस्त क्रांति में अपनी भूमिका निभाई थी। जिनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

शिलापट्ट पर अगस्त क्रांति के छह शहीद का नाम है
कोईलवर प्रखण्ड कार्यालय के सामने शिलापट्ट पर छह शहीदों का नाम अंकित है। जिनमें स्वतंत्रता सेनानी कपिलदेव राम (कोईलवर), ब्रजेश नन्दन वर्मा, मिठ्ठू महतो (नरवीरपुर) सूर्यदेव कुमार(चांदी), हातिम अली, जयराम सिंह(धन्डीहा) के नाम हैं। जिस शिलापट को भारत के आज़ादी के 25 वर्ष पूरे होने पर 15 अगस्त 1972 को स्थापित किया गया था। जिस पर भारत के संविधान की प्रस्तावना है।

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