माताओंं ने संतान की लंबी आयु के लिए रखा व्रत:निर्जला उपवास रखकर महिलाओं ने व्रतकथा का किया श्रवण, भगवान को लगाया भोग

आरा2 महीने पहले
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जिउतिया व्रत के दौरान 29 सितंबर को माताओं ने अपने संतान की लंबी आयु के लिए निर्जला उपवास रखा। इस दौरान आरा शहर के पकड़ी स्थित श्री श्री जोड़ा मंदिर, बुढ़वा महादेव मंदिर, रमना स्थित महावीर मंदिर, कतिरा स्थित सहदेव गिरी मंदिर सहित कई मंदिरों में जाकर कथा सुनने का काम किया। 30 सितंबर के सूर्योदय के बाद माताएं पारण करेंगी।

पूजा के पहले माताएं स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करके भगवान जीमूतवाहन की पूजा अर्चना की। इस व्रत में मिट्टी और गाय के गोबर से चील व सियारिन की मूर्ति बनाई गई थी। इनके माथे पर लाल सिंदूर का टीका लगाया गया था। इधर महावीर मंदिर के पूजारी सुमन बाबा ने बताया कि जिउतिया व्रत की कथा महाभारत काल से जुड़ी है। धार्मिक कथाओं के अनुसार महाभारत के युद्ध में अपने पिता की मौत का बदला लेने की भावना से अश्वत्थामा पांडवों के शिविर में घुस गया। शिविर के अंदर पांच लोग सो रहे थे।

अश्वत्थामा ने उन्हें पांडव समझकर मार दिया। परंतु वे द्रोपदी की पांच संतानें थीं। अश्वत्थामा ने फिर से बदला लेने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चें को मारने का प्रयास किया और उसने ब्रह्मास्त्र से उत्तरा के गर्भ को नष्ट कर दिया था, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा की अजन्मी संतान को फिर से जीवित कर दिए थे।

गर्भ में मरने के बाद जीवित होने के कारण उस बच्चे का नाम जीवित्पुत्रिका रखा गया था। तब उस समय से माताएं अपने संतान की लंबी उम्र के लिए जिउतिया का व्रत रखती है। इधर, कोईलवर में बुधवार को अपने पुत्र की दीर्घायु के लिए श्रद्धालु महिलाओं ने निराजल जिउतिया का व्रत रखा।

जिसे लेकर गोरया घाट के समीप सोन नदी में श्रद्धालु महिलाओ की भीड़ उमड़ी। जिउतिया की कथा सुनने के लिए जगह-जगह से व्रती महिलाओं सोन नदी के किनारे पहुँच महिलाओं में नदी में डुबकी लगाई। इस दौरान महिलाओं ने व्रत का अनुष्ठान किया। देर शाम व्रती महिलाओं ने बांस के डाले में मिष्ठान्न, पकवान, फल, फूल सजा कर चिल्लो शियारों की कथा सुनी। इस व्रत को लेकर कई किंवदंती है।

व्रत में भगवान सूर्य की पूजा की जाती है तो कहीं जीमूतवाहन राजा की पूजा की जाती है। चिल्लो शियारों की कथा के बाद महाभारत का एक प्रसंग आता है जिसमें अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की रक्षा के बाद परिक्षित का जन्म हुआ। कहा जाता है कि तभी से यह व्रत चलन में है। जीमूतवाहन ने गरूड़ से नागवंशियों की रक्षा की थी जिसके बाद से व्रत प्रचलन में आया।

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