300 साल पुराना है औरंगाबाद का पातालगंगा मठ:मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन यहां बने बांझन कुण्ड में स्नान से होती है संतान प्राप्ति

औरंगाबाद22 दिन पहले
पातालगंगा मठ में स्थित बांझन कुंड।

औरंगाबाद शहर से 12 किलोमीटर देव नामक स्थान पर प्राचीन देव सूर्य मंदिर स्थित है। महापर्व छठ को लेकर इस मंदिर का अपना धार्मिक महत्व है। प्राचीन सूर्य मंदिर के कारण इलाके को भास्कर की नगरी भी कहा जाता है। वहीं, देव सूर्य मंदिर से 1 किलोमीटर की दूरी पर पातालगंगा मठ है। यहां दो कुंड बने हैं। ब्रह्म कुण्ड और बांझन कुण्ड। मठ के महंत आदित्यनाथ ब्रह्मचारी के अनुसार, इनका निर्माण 17वीं शताब्दी में हुआ था।

ऐसी मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन बांझन कुण्ड में स्नान करने से महिलाओं को संतान की प्राप्ति होती है। कार्तिक पूर्णिमा को यहां भव्य मेला लगता है। इसलिए कई राज्यों से लोग यहां कार्तिक छठ मनाने आते हैं और भगवान भास्कर को अर्घ्य देते है। पाताल गंगा मठ में सभी देवी देवताओं की प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का पुजारी सिर्फ ब्रह्मचर्य व्यक्ति ही होता है। ब्रह्म कुण्ड चौकोर आकर का है। वहीं, बांझन कुण्ड का आकार त्रिकोण है।

300 साल पुराना है पातालगंगा मठ
पातालगंगा मठ के महंत आदित्यनाथ ब्रह्मचारी ने बताया- "करीब 300 साल पहले 17वीं शताब्दी में यहां नैमिषारण्य से बाबा ज्ञानीनंद ब्रह्मचारी 'देव' की भूमि पर आए थे। तब इस क्षेत्र के राजा भीष्म देव नारायण सिंह थे। बाबा ने राजा से अपने पूजा-अर्चना के लिए एक स्थान मांगा। राजा ने उन्हें इसी स्थान पर रहने को कहा। तब यह पूरा क्षेत्र जंगल हुआ करता था।

इसी स्थान पर बेल के पेड़ के नीचे बाबा ज्ञानीनंद ब्रह्मचारी ने अपना आश्रम बनाया। कुछ महीने गुजरने के बाद क्षेत्र में पानी की किल्लत हुई। लोग पानी के लिए तड़प रहे थे। तब राजा भीष्म देव नारायण ने बाबा ज्ञानीनंद से मदद मांगी। इसके बाद लोक कल्याण के लिए बाबा ने अपनी चुटा को जमीन में गाड़ दिया। तभी यहां पाताल से पानी निकलने लगा। और तब से इस स्थान का नाम पतालगंगा मठ रखा गया।"

बाबा ज्ञानीनंद ब्रह्मचारी ने यहां ली थी जीवित समाधि
पाताल गंगा मठ के वर्तमान महंत आदित्यनाथ ब्रह्मचारी ने बताया कि पहले महंत बाबा ज्ञानीनंद ब्रह्मचारी और दूसरे महंत अभयानंद ब्रह्मचारी ने 1768 में मन्दिर परिसर में ही जीवित समाधि ली थी।

बांझन कुण्ड में स्नान करने से होती है संतान की प्राप्ति
मंदिर कमेटी के सदस्य उपेंद्र यादव ने बताया कि - "पातालगंगा में स्थित बांझन कुण्ड में कार्तिक के पूर्णिमा के दिन महिलाओं की भीड़ लगती है। ऐसी मान्यता है कि जिस महिला को संतान नहीं है, अगर वो यहां बांझन कुंड में स्नान करती है। तो साल भर के अंदर संतान की प्राप्ति होती है।" उपेंद्र यादव ने इसके पीछे की मान्यता बताई।

उन्होंने कहा कि ऐसा कहा जाता है कि बाबा ज्ञानीचंद ब्रह्माचारी के चमत्कार के बाद यहां आस-पास के क्षेत्रों से लोग अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए बाबा के पास आते थे। वहीं, संतान प्राप्ति को लेकर महिलाएं भी यहां बाबा से आशीर्वाद लेने के लिए आती थी। तब बाबा ने कार्तिक पूर्णिमा को यहां पर दो कुण्ड का निर्माण कराया था। इसी का नाम ब्रह्म कुण्ड और बांझन कुण्ड रखा गया। कहा जाता है कि ब्रह्म कुण्ड में सिर्फ पुरुष और बांझन कुंड में सिर्फ महिलाएं ही स्नान करती हैं।

(इनपुट- राज पाठक, औरंगाबाद)

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