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रात की पहली तस्वीर:रात में हाईवे पर चलते प्रवासी मजदूर बोले-मजबूर हूं क्योंकि मजदूर हूं, वरना हमारे लिए भी होता इंतजाम

औरंगाबाद6 महीने पहले
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  • मजदूरों को रात में न अपराधियों का भय न वाहनों से कुचलने का डर, बस एक ही इरादा घर पहुंचना है
  • रात में प्रवासियों के दर्द जानने के लिए भास्कर ने हाईवे पर 35 किलोमीटर यात्रा कर जाना उनका हाल

(ओम प्रकाश सिंह) शनिवार की रात वक्त रात करीब 10:30 बज रहा था। रात में प्रवासियों के पैदल चलने की मजबूरी व सिस्टम की व्यवस्था की हाल जानने के लिए दैनिक भास्कर ने नाइट वॉच किया। इसमें रात में प्रवासियों के दर्द की पहली तस्वीर निकल कर आई। रात में एनएच दो व एनएच 139 पर करीब 35 किलोमीटर यात्रा कर प्रवासी मजदूरों के दर्द की लाइव पड़ताल की। इसमें हाईवे पर पैदल चल रहे प्रवासी मजदूरों ने जो बताया उसे पढ़कर आपका मन विचलित हो सकता है और आपके रोंगटे खड़े हो सकते हैं। लेकिन यह हकीकत है।

प्रवासी मजदूरों के घर पहुंचने की बेबसी अपनी अंतिम हद तक पहुंच गई है। उनका कहना है हम मजबूर हैं साहब, क्योंकि हम मजदूर हैं। वरना इंतजाम हमारे लिए भी होता। हम दोहरी मार झेल रहे हैं। एक तरफ कोरोना है तो दूसरी तरफ भूख। हमें हर कोई कोराेना की नजर से देखता है। जिसके कारण मदद भी नहीं मिल रही। लिहाजा भूखे-प्यासे पैदल चल रहे हैं। रात-दिन या दोपहर हो पैदल चलना हमारी मजबूरी है। हम मरने जैसे हालात से जुझ रहे हैं। जब तक सांस है तब तक आस है। हम चलते रहेंगे अपनी मंजिल की ओर... अपने गांव की ओर, अपने घर की ओर।
बाहर मरने से अच्छा है अपनी जन्मभूमि पर मरें, बंगाल से पैदल जा रहे मुजफ्फरपुर
आठ लड़कों की टोली 13 दिन पहले यानी 4 मई को बंगाल से मुजफ्फरपुर जाने के लिए पैदल निकली है। लाइव पड़ताल में एनएच 139 में खैरा-खैरी गांव समीप इस टाेली के नीरज कुमार, रंजय, फूल कुमार ने बताया कि वे लोग एक केमिकल प्लांट में वहां काम करते थे। लॉकडाउन बाद कंपनी का ठेकेदार अपना हाथ खड़ा कर दिया और वेतन भी नहीं दिया। मकान मालिक भी बाहर निकाल दिया। फिर दर-बदर भटकने लगे। कभी यहां तो कभी वहां अप्रैल तक समय काटी। फिर मरने जैसी हालत से जुझने लगे। लिहाजा हम सभी ने फैसला किया कि बाहर मरने से अच्छा है अपने जन्मभूमि पर मरें।

4 मई को कुछ बिस्कीट के पैकेट व बोतल में पानी लेकर निकले। 70 से 80 किलोमीटर यात्रा के दौरान बिस्कीट भी खत्म हो गया। बचा तो सिर्फ हौंसला व चापाकल का पानी। झारखंड में दो-तीन जगह खाना मिला और पानी। बिहार में दो जगह खाना मिला। 13 दिन के यात्रा के बाद औरंगाबाद पहुंचे हैं। अभी मुजफ्फरपुर जाना है। वे सभी मुजफ्फरपुर के साहेबगंज गांव के रहने वाले हैं। उनलोगों ने बताया कि अभी भी उनका मंजिल अभी काफी दूर है। लेकिन उनके हौंसले के आगे यह कोई मायने नहीं रखता।  बंगाल से लेकर बिहार तक कहीं भी सिस्टम का सुविधा उन्हें नहीं मिला। लिहाजा वे पैदल चल रहे हैं।

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