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आस्था:बछवाड़ा के बेगमसराय गांव में बंगाली पद्धति से की जाती है मां दुर्गा की पूजा, होती हैं मन्नतें पूरी

बछवाड़ाएक महीने पहले
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  • यह एकमात्र दुर्गा स्थान है जहां आज भी बंगाली समुदाय की परंपरा को जीवंत रखा गया है

शारदीय नवरात्र के सातवें दिन शुक्रवार को प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न दुर्गा मंदिरों में मां भगवती की कालरात्रि स्वरूप में मां की पूजा अर्चना की गई। बछवाड़ा प्रखंड के रानी दो पंचायत के बेगमसराय गांव की मां दुर्गा का अपना अलग महत्व है। वर्षो पूर्व बंगाल से लाई गई मां दुर्गे की पूजा बंगाली पद्धति से की जाती है।

यह एक मात्र दुर्गा स्थान है जहां आज भी बंगाली समुदाय की परंपरा को जीवंत रखे हुए है। प्रखंड के बेगमसराय दुर्गा मां की महिमा अपार है। उनके दरबार में जो भी व्यक्ति सच्चे दिल से जाते हैं उनकी मन्नते पूरी करती हैं। यहां की खास बात यह है की यहां प्रतिमा का निर्माण नहीं होता है। एक छोटी सी प्रतिमा मंदिर परिसर में है जिस प्रतिमा का विशर्जन नहीं होता है। बेगूसराय ही नहीं वरन कई जिले के विभिन्न इलाके से श्रद्धालु मन्नतें पूरी होने पर मां के दरबार में आते हैं।
क्या है इतिहास
इस संबंध में रानी दो पंचायत बेगमसराय गांव निवासी पूजा समिति के मेरपति महेश प्रसाद सिन्हा, सुरेन्द्र मोहन सिन्हा, संदीप कुमार सिन्हा ने बताया कि वर्षो पूर्व बंगाल से पूर्वजों ने मां की प्रतिमा को विधि विधान के अनुसार बेगमसराय गांव में लाया जा रहा था। बेगमसराय में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करनी थी लेकिन बंगाल से मूर्ति लाने के दौरान भगवानपुर थाना के लखनपुर बलान नदी के किनारे नदी पार करने के लिए रखा गया।

जिस कारण लखनपुर नदी के किनारे ही मां दुर्गा को स्थापित कर बंगाली समुदाय के लोगों ने पूजा पाठ शुरू कर दिया। तब से कुछ बंगाली समुदाय के कुछ लाेग वहीं बस गए और तब से आज तक लखनपुर और बेगमसराय दोनों जगह पूजा की जाती है। भवाननपुर के चक्रव्रती परिवार के पंडित आकर पहले बेगमसराय में पूजा करते है। उसके बाद लखनपुर में पूजा की जाती है।
क्या है पूजा-पद्धति
मां की पूजा के बारे में मेरपति ने बताया कि पहले जिउतिया पारन के नवमी के दिन पूजा का संकल्प लिया जाता है फिर सप्तमी के दिन वैधानिक ढंग से गंगा नदी में पूजा कर कलश स्थापित की जाती है।

बखरी के ऐतिहासिक दुर्गा पूजा में वर्षों पुरानी कई परंपराएं हुईं स्थगित

बखरी | कोरोना महामारी के मद्देनजर बखरी के एतिहासिक दुर्गा पूजा में इस बार एक साथ कई परंपराओं का निर्वहन नहीं हो सकेगा। सरकारी गाइडलाइन के अनुसार ना ही मेला का आयोजन होगा और ना ही नवमी को बलिप्रदान किया जाएगा। बखरी बाजार स्थित शक्ति पीठ पुरानी दुर्गा मंदिर,सार्वजनिक नव दुर्गा स्थान तथा वैष्णवी दुर्गा मंदिरों में सरकार द्वारा जारी गाइडलाइन का अक्षरशः पालन हो सके इसको लेकर तीनों मंदिर समितियों की ओर से मुक्कमल तैयारी की गई है।

कोरोना का कोई प्रभाव मंदिर परिसर में नहीं फैले इसके लिए आवश्यक उपक्रमों के उपयोग के साथ एहतियात बरते जा रहे हैं। पुरानी दुर्गा मंदिर के अध्यक्ष तारानंद सिंह ने बताया कि मंदिर परिसर में एक सौ से ज्यादा भीड़ इकठ्ठा नहीं हो, इसका पूरा प्रयास किया जा रहा है। वहीं नवमी को बड़ी संख्या में होने वाले छागर एवं भैंसा बलि प्रदान पूरी तरह से स्थगित कर दिया गया है।

जबकि दशमी के दिन परंपरा के अनुसार निकाले जाने वाले जतरा (शोभा यात्रा) भी नहीं निकाली जाएगी। श्रद्धालुओं के आस्था को ध्यान में रखते हुए मंदिर परिसर में दो अलग अलग पात्र लगाए गए हैं। जहां श्रद्धालु माता का दर्शन कर कपड़ा में लपेटे खोंइचा को एक पात्र डाल देंगे। वहीं जिन्हें माता को प्रसाद चढाना हो वे दूसरे पात्र में सीधे डाल सकते हैं। पुरानी दुर्गा मंदिर के अअध्यक्ष तारानंद सिंह ने बताया कि अष्टमी, नवमी व दशमी के दिन मंदिर के पुजारी थे।

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