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दहशत में कर्मी:जीडी कॉलेज जूलॉजी विभाग का भवन जर्जर, प्रबंधन नहीं ले रहा संज्ञान

बेगूसराय6 दिन पहले
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  • बड़े हादसे को आमंत्रण देता जीडी कॉलेज जूलॉजी व बॉटनी विभाग का जर्जर छत

जीडी कॉलेज के बॉटनी एवं जूलॉजी डिपार्टमेंट के जर्जर छत के नीचे छात्र-छात्रा प्रायोगिक परीक्षा देने को विवश हैं। जब दैनिक भास्कर प्रतिनिधि ने जीडी कॉलेज के जंतु विज्ञान विभाग व जीव विज्ञान विभाग तो बिल्कुल अजीबोगरीब नजारा देखने को मिला। 200 की संख्या में छात्र छात्रा सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए मास्क लगाकर प्रायोगिक परीक्षा दे रहे थे।

जिनके सर के उपर टूटी हुई छत किसी बड़े हादसे को आमंत्रण दे रहा था । जब छात्र- छात्राओं से भास्कर टीम ने पड़ताल की तो उन्होंने बताया कि आए दिन छत गिरने की घटनाएं होते रहती है। जब वर्ग चलता है तो वर्ग की छत अचानक से टूट टूट कर गिरते रहती है। विगत कुछ दिन पूर्व भी जंतु विज्ञान विभाग में वर्ग के दौरान अचानक से पंखा टूट कर गिर गया।

भगवान भरोसे छात्र-छात्रा प्रैक्टिकल देकर अपनी जान बचा रहे हैं, किंतु इस स्थिति से निपटने में कॉलेज प्रशासन पूरी तरह से फिसड्डी साबित हुई है। जीडी कॉलेज पूरे मिथिला विश्वविद्यालय में सबसे अधिक राजस्व वसूलता है और उस कॉलेज का विभाग यदि मूलभूत सुविधाओं के लिए उद्धारक की राह जोहता रहे तो इससे अधिक लज्जा की बात क्या हो सकती है?

नियमित वर्ग करने वाले कुछ छात्र छात्राओं ने यह भी बताया कि हल्की सी बरसात में भी पूरे छत से पानी रिसता रहता है और उस स्थिति में छात्र छात्रा वर्ग करते हैं। कई विभागों में पानी जमा हुआ रहता है जिसके निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है और ना ही कॉलेज प्रशासन उसकी मरम्मती पर ध्यान देती है।

इन सबों के बावजूद दिलचस्प बात यह है कि उक्त विभाग की मरम्मती के 1 वर्ष भी पूरे नहीं हुए हैं। कुछ स्रोतों से यह पता चला है कि मरम्मती के नाम पर भी पैसा लूटने का खेल चलता है। जब वनस्पति विज्ञान विभाग में दैनिक भास्कर की टीम पहुंची तो कंप्यूटर के ऊपर छत के टुकड़े गिरे हुए थे। इस स्थिति में छात्र-छात्राओं का भविष्य कैसे तैयार होगा ? यह कहना मुश्किल है। जो विभाग कभी विद्वानों एवं उनके रचनात्मक कार्य के लिए देश स्तर पर जाना जाता था आज प्रशासनिक अक्षमता की वजह से यह विभाग केबल इतिहास के पन्नों में ही सिमट ने को विवश है। पिछले वर्ष रंग रोगन व मरम्मती का कार्य किया गया था , किंतु गुणवत्ताहीन कार्य का फल यह है कि 1 वर्ष भी पूरा नहीं हुआ और छत गिरने लगा।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि मरम्मत के नाम पर कॉलेज प्रोस्पेक्टस व नामांकन रसीद के मुताबिक प्रत्येक वर्ष 14 लाख रुपया छात्र-छात्राओं से नामांकन के समय वसूला जाता है ।यदि एक बार भी यह पैसा सही तरीके से खर्च कर दिया जाए तो विभागों एवं वर्ग कक्ष की यह स्थिति नहीं रहेगी। यह भी एक सोचनीय बात है कि समय-समय पर छात्र संघ व विभिन्न छात्र संगठनों के द्वारा गुणवत्ताहीन कार्य करने वाले ठेकेदारों को बदलने की मांग की जाती रही है।

किंतु कॉलेज प्रशासन किन के दबाव में गुणवत्ताहीन कार्य करने वाली एजेंसी को ही कार्य का ठेका दे रही है यह भी नहीं कहा जा सकता है। इस स्थिति में आज कॉलेज पहुंच चुका है वैसी स्थिति मैंने आज तक नहीं देखी थी और इतने समस्याओं के बावजूद भी प्राचार्य का रवैया अरियल है।

पिछले 3 महीने में केवल नामांकन के द्वारा 1.3 करोड़ रुपैया छात्र छात्राओं से लिया गया किंतु जब प्राचार्य से कॉलेज में समस्या निवारण की बात की जाती है तो वह आचार संहिता व कोरोना का बहाना बनाते हैं। कार्य में गुणवत्ता तो दूर की बात है किसी भी निष्पक्ष जांच समिति से यदि विगत 5 वर्ष के कार्य की जांच कराई जाए तो कॉलेज के बड़े बड़े सफेदपोश जांच के घेरे में आ जाएंगे और करोड़ों रुपए के लूट का पर्दाफाश हो जाएगा।

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