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आस्था:निर्माण और सृजन के भगवान विश्वकर्मा की पूजा आज, 12ः00 बजे से शाम 5ः05 तक पूजा का मुहूर्त सबसे उत्तम

बेगूसराय3 दिन पहले
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विश्वकर्मा पूजा के लिए बाजारों में सजी दुकानों में खरीदारी करने पहुंचे लोग।
  • खरीदारी के लिए बाजार में उमड़े लोग, दो पहिया वाहनों के सर्विस सेंटरों पर दिखी अधिक भीड़

निर्माण तथा सृजन के भगवान विश्वकर्मा की पूजा को लेकर गांव से लेकर शहर में उत्साह देखा जा रहा है। कोरोना के बावजूद विश्वकर्मा पूजा की तैयारी लोग जोर शोर से कर रहे हैं।

विश्वकर्मा पूजा पर कोरोना का असर बहुत ही कम देखा जा रहा है, क्योंकि हर साल की तरह ही इस साल भी पूजा सामाग्री को लेकर बाजार सजे और ब्रिक्री भी हुई। इतना ही नहीं सभी तरह के वाहनों के सर्विस सेंटर में भारी भीड़ तीन दिनों से देखी जा रही है। सबसे ज्यादा भीड् दो पहिया वाहनों के सर्विस सेंटर में देखी गई।

पूजा का मुहूर्त

पंडित रिपु सुदन ठाकुर के अनुसार विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर गुरुवार को है। कन्या राशि में सूर्य संक्रांति का प्रवेश गुरुवार को पूर्वाह्न 11ः13 पर है। अमावस्या शाम 5ः05 तक रहेगा। विश्वकर्मा पूजा का अपराह्न 12ः00 बजे से शाम 5ः05 तक सबसे उत्तम मुहूर्त माना गया है। इसके बाद शाम 6ः10 से रात 10ः10 तक मध्यम मुहूर्त है।

लोगों ने बिठाई मूर्ति

विश्वकर्मा पूजा को लेकर देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा की पूजा किए जाने को लेकर तैयारी अंतिम चरण में है। मूर्तिकार प्रतिमा को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं। दूसरी तरफ बाजारों में पूजन सामग्री की खरीदारी को लेकर बुधवार को लोगों की बाजारों में भीड़ लगी रही। बाजार में कई दुकानों में फूल, माला आदि की खरीदारी लोगों ने की।

पूजा का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संसार में जो भी निर्माण या सृजन कार्य होता है, उसके मूल में भगवान विश्वकर्मा विद्यमान होते हैं। उनकी आराधना से आपके कार्य बिना विघ्न पूरे हो जाएंगे। बिगड़े काम भी बनेंगे। इसलिए हर साल विश्वकर्मा की पुजा की जाती है। पंडित रिपु सुदन ठाकुर ने बताया कि वास्तु देव तथा माता अंगीरस की संतान भगवान विश्वकर्मा हैं। वे शिल्पकारों और रचनाकारों के ईष्ट देव हैं। उन्होंने सृष्टि की रचना में ब्रह्मा जी की मदद की तथा पूरे संसार का मानचित्र बनाया था। भगवान विश्वकर्मा ने स्वर्ग लोक, श्रीकृष्ण की नगरी द्वारिका, सोने की लंका, पुरी मंदिर के लिए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा की मूर्तियों, इंद्र के अस्त्र वज्र आदि का निर्माण किया था। ऋगवेद में उनके महत्व का पूर्ण वर्णन मिलता है।

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