मां आरण्य देवी मंदिर का अद्भुत है इतिहास, देखें Video:रामायण काल से जुड़ी है कहानी, देवी के नाम पर ही रखा गया शहर का नाम; मन्नत पूरी होने तक घी के बड़े दीये जलाते हैं श्रद्धालु

आरा7 महीने पहले
मां आरण्य देवी मंदिर।

नवरात्रि में रविवार को चौथे दिन मां कुष्मांडा की पूजा की जा रही है। ऐसे में आज हम बता रहे हैं भोजपुर जिला मुख्यालय आरा में पूर्वी-उत्तरी छोर पर स्थित मां आरण्य देवी के अति प्राचीन मंदिर के बारे में। इसी मंदिर के नाम पर इस शहर का नाम आरा पड़ा है। मंदिर का इतिहास रामायण काल और पांडव से भी जुड़ा है। इस मंदिर में काले पत्थरों की महा सरस्वती की बड़ी मूर्ति और महालक्ष्मी की छोटी प्रतिमा है। इस मंदिर को किला की देवी के नाम से भी जानते हैं। यहां श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने तक घी के बड़े दीए जलाते हैं।

पुजारी मनोज बाबा के अनुसार, मान्यता है कि माता सती का एक अंग यहां भी गिरा था। आरा को शोध संगम क्षेत्र के नाम से भी जाना जाता था। शोध संगम स्थान का नाम त्रिपुरा रहस्य और मत्स्य पुराण में भी प्राप्त होता है। इसमें शोध संगम स्थान गंगा और सोन के संगम के विषय में वर्णन किया गया है। गंगा और सोन के संगम किनारे आरण्य वन था। आज भी भोजपुर जिला अंतर्गत आरा नगर से 10 KM पूरब क्षेत्र में कोईलवर प्रखंड के बिन्दगांवा ग्राम के पास गंगा का संगम वर्तमान में भी है।

साल भर मंदिर में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ उमड़ती है।
साल भर मंदिर में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ उमड़ती है।

पुजारी मनोज बाबा ने बताया कि इस मंदिर से जुड़ी एक कहानी यह भी है कि ताड़का वध के बाद भगवान राम अपने गुरु विश्वामित्र और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ बक्सर से सीता स्वयंवर के लिए मिथिला जा रहे थे। आरा से गुजरते समय उन्होंने इस मंदिर में पूजा अर्चना की थी। एक अन्य मान्यता के अनुसार, वनवास के दौरान पांडव ने भी यहां देवी की पूजा-अर्चना की। यहीं पर देवी ने प्रकट होकर उन्हें वरदान भी दिया था।

इस मंदिर में काले पत्थरों की महा सरस्वती की बड़ी मूर्ति और महालक्ष्मी की छोटी प्रतिमा है।
इस मंदिर में काले पत्थरों की महा सरस्वती की बड़ी मूर्ति और महालक्ष्मी की छोटी प्रतिमा है।

मां आरण्य देवी मंदिर के पुजारी मनोज बाबा ने बताया कि पूर्वज कहते रहे हैं कि जब पांडव यहां रात्रि विश्राम कर रहे थे तब धर्मराज युधिष्ठिर को माता ने सपने के माध्यम से बताया कि हमारी एक बहन की यहां पर स्थापना करो। इसके फलस्वरूप धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा माता आरण्य देवी की प्रतिमा की स्थापना की गई थी। मां की शक्ति चारों तरफ फैली है। मां के दरबार से कभी कोई खाली नहीं जाता है। नवरात्रि के समय देश के कई इलाकों से यहां काफी संख्या में भक्त दर्शन को आते हैं और अपनी मनोकामना पूरी होने पर माता का श्रृंगार भी करवाते हैं।

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