विशेषज्ञों की सलाह:जीरो टिलेज से खेती करिए, कम समय और लागत में ही खेतों में हो जाएगी अच्छी उपज

बिहारशरीफ़एक महीने पहले
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खेतों में जानकारी देते कृषि वैज्ञानिक। - Dainik Bhaskar
खेतों में जानकारी देते कृषि वैज्ञानिक।
  • जीविका की महिलाओं ने आलू लगाने के लिए जीरो टिलेज पद्धति का किया प्रदर्शन
  • जीविका परियोजना से जुड़े किसानों को सिखाई गई तकनीक

अंतरराष्ट्रीय आलू संस्थान लीमा पेरू के जीरो टिलेज पोटेटो प्रोजेक्ट के तहत जीविका परियोजना से जुड़े किसानों के बीच आलू उत्पादन के जीरो टिलेज तकनीक का प्रदर्शन किया गया। प्रखंड अंतर्गत सैदी गांव में जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ी संजू देवी एवं लालमुनी देवी की खेत पर जीरो टिलेज विधि से आलू लगाया गया। इसके लिए किसानों को बीज देकर जीरो टिलेज मशीन से बोआई कराई गई। इन्हें बताया गया कि अब किसानों को केवल सिंचाई कर फसल की देख करनी होगी।इस तकनीक से बोआई करने में समय की बचत होगी। खर्च भी काफी कम लगेगा। उत्‍पादन भी अच्‍छी होगी। इसके साथ ही प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी होगा। उक्त तकनीक को अपनाने के बाद किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। इस मौके पर संस्थान के वैज्ञानिक डॉ एस के ककरालिया ने इस विधि के बारे में किसानों के बीच बताया कि जीरो टिलेज तकनीक आलू लगाने की ऐसी विधि है जिसमें धान की कटाई के तुरन्त बाद खेत की जुताई किए बिना ही आलू की खेती की जाती है। उन्होने कहा कि जीरो टिलेज तकनीक को किसान जरूर अपनाएं। इससे उन्हें काफी फायदे होंगे। कम लागत और कम समय में अच्छी उपज होगी।

10-12 दिन में करें पहली सिंचाई, फिर नमी अनुसार

इस तकनीक के फायदे के बारे डॉ ककरालिया ने बताया की धान की कटाई के तुरंत बाद आलू की फसल को लगाया जा सकता है । इस विधि में खेत की जुताई किए बिना आलू की फसल को लगाया जाता है जिसमें बहुत ही कम मजदूर (लेबर) की जरुरत होती है। इस विधि को अपनाने से किसान जुताई खर्च एवं मजदूरी खर्च की में बचत कर सकते हैं। कृषि वैज्ञानिक ने यह भी बताया की इस विधि से आलू उत्पादन करने से आलू की गुणवत्ता भी परम्परागत आलू की खेती की तुलना में काफी अच्छी होती है। फसल तैयार होने के बाद जीरो टिलेज तकनीक के खेतों से आलू को जमीन की सतह से सीधे एकत्रित कर बोरे में भरा जा सकता है। जबकि परम्परागत तरीके से लगाए गए आलू के खेत में आलू को उखाड़ने के लिए मशीन एवं मजदूर का सहयोग लिया जाता है जिससे काफी मात्रा में आलू खराब हो जाता है। किसानों को बताया गया कि इस विधि में एक कतार से दूसरी कतार की दूरी 12 से 15 इंच होनी चाहिए। कतार में रोपाई के लिए एक आलू से दूसरे आलू की दूरी छह इंच होनी चाहिए। ऐसा होने पर ही बेहतर उपज मिलेगी।

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