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मांग:जदयू सांसद ने लोकसभा में उठायी प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के पुनर्निमाण की मांग

बिहारशरीफ12 दिन पहले
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सांसद कौशलेन्द्र कुमार ने नियम 377 के तहत प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय के पुननिर्माण का मामला उठाया है। उन्होंने कहा है कि प्राचीन नालंदा विवि पूरे विश्व में ज्ञान का केन्द्र था। गुप्तवंश के शासक कुमार गुप्त प्रथम ने 450-470 ई. के बीच इसकी स्थापना की थी। यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना था। यहां 10 हजार से अधिक छात्रों के पठन-पाठन की व्यवस्था थी और 2 हजार से अधिक अध्यापक थे। अधिकतर विदेशी विद्यार्थी थे। जो मुख्यतः कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इण्डोनेशिया, फारस, तुर्की आदि देशों के होते थे। उनके लिए यहां विशालकाय पुस्तकालय भवन था। कहा जाता है कि इस पुस्तकालय में 3 लाख से भी अधिक महत्वपूर्ण पुस्तकें थी। नालंदा उस समय उच्च शिक्षा का महत्वपूर्ण और विख्यात केन्द्र था। महायान बौद्ध धर्म के इस शिक्षा-केन्द्र में हीनयान बौद्ध धर्म के साथ ही अन्य धर्मों तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। विश्वविद्यालय में आचार्य छात्रों को मौखिक व्याख्यान द्वारा शिक्षा देते थे। व्याकरण, दर्शन, शल्य विद्या, ज्योतिष, योग शास्त्र तथा चिकित्सा शास्त्र भी पाठ्यक्रम में शामिल था। विद्वानों का मत है कि यहां धातु की मूर्तियां बनाने के विज्ञान का भी अध्ययन होता था। यहां खगोल-शात्र अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था। इस विश्व विख्यात विश्वविद्यालय में स्थित पुस्तकालय 9 तल का था, जो हजारों विद्यार्थियों और आचार्यों के अध्ययन का केन्द्र था। इस बौद्ध विश्वविद्यालय के अवशेष के खोज का श्रेय अलेक्जेंडर कनिंघम को जाता है। सांसद श्री कुमार ने कहा कि सन् 1199 में तुर्की शासक बख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय में आग लगवा दी थी। कहा जाता है कि विश्वविद्यालय में इतनी पुस्तकें थी कि पूरे तीन महीने तक यहां पुस्तकालय में आग धधकती रही। उसने प्राचीन भारत की उपलब्धि को नष्ट करने के लिए यह सब क्रूर कार्य किया था।

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