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इबादत:अलविदा जुमे पर जिले में रोजेदारों ने घरों में अदा की जोहर की नमाज, कोरोना को हराने की मांगी दुआएं

बक्सर4 महीने पहले
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  • कोरोनावायरस को लेकर घरों में सोशल डिस्टेंसिंग करते हुए अकीदतमंदों ने अदा की अंतिम जुमे की नमाज
  • आज से शुरू होगी ईद की तैयारी, सजने लगे बाजार; लॉकडाउन से बाजार मेंं रौनक कम

रमजान उल मुबारक महीने का अलविदा (आखिरी) जुमे की नमाज शुक्रवार को अदा की गयी। प्रशासनिक निर्देश के बाद मस्जिदों में जुमे की नमाज में सिर्फ चार से पांच लोग ही अदा करने की अनुमति मिली। जिन्हें सोशल डिस्टेंसिंग का पूरा पालन कराया गया। बाकी लोगों ने घरों में जुमे के बजाए जोहर की नमाज अदा की।

बड़ी मस्जिद के इमाम हाफिज रेयाज खान ने कहा कि रमजान उल मुबारक का आखिरी जुमा अब हमसे रुखसत हो रहा है जो अपने दामन में अनमोल मोती समेट चुका है जो हमारी इबादत की शक्ल में किया है। अलविदा जुमा हमें यह एहसास दिलाता है कि रमजान का ये अफजल और नेक महीना हमारे बीच से रुखसत हो रहा है। इस दिन मुस्लिम धर्म के लोग जोहर के वक्त अलविदा जुमा की नमाज पढ़ते हैं। लेकिन इस बार मंजर ही कुछ और है।
दोनों नमाजों के लिए कुत्बा जरूरी
कोरोनावायरस की वजह से देशभर में लॉकडाउन लागू है। ऐसे में किसी भी धार्मिक स्थल पर जमा होना सख्त मना है। इस वजह से मुस्लिम बंधुओं व रोजेदारों को अपने घरों के अंदर रहकर ही इबादत करना है। हालांकि जुमे की और ईद की नमाज बाकी नमाज से थोड़ी अलग होती है। इसलिए इसे घर पर पढ़ना मुश्किल होता है। इन दोनों नमाजों के लिए कुत्बा जरूरी होता है और कुत्बा हर किसी के जहन में कैद नहीं हो सकता है। ये एक तरीके की तकेरीर होती है जिसमें दुआएं शामिल होती हैं।
जो पाया है उसी को नेमत कहते हैं 
इमाम ने कहा कि रमजान के दौरान बिना ख्वाहिशों के खुदा की बन्दगी करना जरूरी है। इस बार कोरोना वायरस व लॉक डाउन के कारण जीवन अस्तव्यस्त जरूर हो गया। लेकिन, हमें उम्मीद है कि इस महीने में हमने खोया कुछ नहीं पाया बहुत कुछ है, जो पाया है उसी को नेमत कहते हैं। इस इनाम का नाम ईद है। बीते दिनों प्रशासन व तंजीमों ने लॉकडाउन के मद्देनजर अलविदा जुमा और ईद की नमाज घरों में पढ़ने की अपील की है। 
सबसे पहले जरूरतमंद भाई-बहनों को दें जकात: इमाम हाफिज रेयाज खान ने कहा कि पूरे रमजान में जकात का बड़ा महत्व है। जकात में अफजल यह है कि इसे पहले अपने जरूरतमंद भाई-बहनों को दें। उसके बाद करीबी रिश्तेदारों को उसके बाद दूर के रिश्तेदारों के अलावा पड़ोसी अपने साथ काम करने वाले जरूरतमंदों को दे सकते हैं। दीन की पढ़ाई करने वाले छात्रों को भी जकात की रकम दी जा सकती है। जकात का इंकार करने वाला काफिर और अदा न करने वाला फासिक व अदायकी में देर करने वाला गुनाहगार है। अगर आप साहिब ए निसाब हैं तो हकदार को जकात जरूर दें। जकात हलाल और जायज तरीके से कमाए हुए माल में से दी जानी चाहिए।

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