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उपेक्षा का शिकार:उद्घारक की बाट जोह रहा छौड़ाही का पशु अस्पताल

छौड़ाही14 दिन पहले
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  • पशुपालकों ने कहा- प्रत्याशियों से पूछेंगे कब सुधरेगा अस्पताल का हाल

विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही तमाम राजनीतिक पार्टियां क्षेत्र के विकास के मुद्दों को लेकर सुबह से शाम तक ही नहीं रात में भी क्षेत्रों में जनता की नब्ज टटोलने में जुट चुके हैं। किंतु पशुपालक किसान की समस्याओं को आजतक कोई देखने वाला नहीं मिला। जिसका जीता उदाहरण रामपुर कचहरी स्थित पशु अस्पताल है जहां तीन दशक बीत जाने के बाद भी विकास की तलाश है।

कितने चुनाव आए और गए लेकिन जीतने वाले प्रत्याशियों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। जिसका नतीजा यह हुआ कि स्थानीय ग्रामीण यहां अवैध रूप से कब्जा कर लिए हैं तथा जलावन, पशु तथा अन्य सामग्रियों को मवेशी अस्पताल के कैंपस में रखकर इसका दुरूपयोग किया जा रहा है।

इधर विधानसभा चुनाव की रणभेरी बजते ही इसके जीर्णोद्धार तथा स्थायी पशु चिकित्सक तथा कम्पाउंडर के पदस्थापित करना अहम चुनावी मुद्दा बनकर सामने आ रहा है। उपेक्षा का शिकार वोटर चुनाव जीतने के बाद लौट कर वापस नहीं आने वाले नेताओं तथा उनके झूठे आश्वासन से आजिज होकर प्रत्याशियों को सबक सिखाने का मन बनाया है।
निजी क्लिनिकों में पशु चिकित्सकाें से पशुओं का इलाज कराने काे विवश हैं पशुपालक
ग्रामीण बताते हैं कि पशु अस्पताल में चिकित्सक नहीं रहने से मजबूरन प्राइवेट पशु चिकित्सकों से महंगे दामों पर बीमार पशुओं का इलाज कराने को विवश हैं। उपेक्षा का शिकार पशुपालकों की माने तो जब-जब लोकसभा तथा विधानसभा चुनाव हुआ प्रत्याशी हाथ जोड़े वोट मांगने तो आए।

जीतकर सांसद व विधायक भी बने लेकिन जीतने के बाद कोई वापस भेंट करने तक नहीं आए जिससे कि उन्हें इस समस्या से अवगत कराया जा सके। जिसे हमलोग अब इस विधानसभा चुनाव में मुद्दा बनाकर तमाम वोट मांगने वाले प्रत्याशियों से अवश्य पूछेंगे।

1990 के बाद से नहीं हाेता है पशुओं का इलाज

पशुपालक रामचंद्र महतो, कारी शर्मा, सिंटू कुमार, रामलोचन महतो, मिंटू कुमार बताते हैं कि आजादी के बाद सन 1952 में स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से रामपुर कचहरी में पशु अस्पताल की स्थापना की गई। जिसमें एक पशु चिकित्सक तथा एक कम्पाउंडर पशु अस्पताल में रहा भी करते थे।

स्थापना के बाद लखनपट्टी, इब्राहिमपुर, मालपुर, पार मालपुर, सैदपुर, श्यामपुर, बरैपुरा, बथौल, गौड़ीडीह समेत आसपास के अनेक गांवों के पशुपालक पशुओं में गंभीर बीमारी होने पर इलाज कराने यहां आते थे। लगभग सन 1990 तक यहां पशुओं का इलाज सुचारू रूप से चल रहा था।

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