परंपरा:डुमरांव में मुस्लिम परिवार का पुस्तैनी धंधा है महापर्व छठ पर महावर बनाना

डुमरांव25 दिन पहले
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  • हिन्दू-मुस्लिम एकता का पर्याय रूप छठ महापर्व, जात पात के टूट जाते हैं बंधन

एक ही आबो हवा में पलने बढ़ने वाले लोग कैसे अलग-अलग हो जाते हैं। धर्म और संप्रदाय में बंट जाते हैं। लेकिन, परमात्मा मानव में भेद नहीं करते। उनकी नजर में सभी एक हैं। हम बात कर रहे हैं सांप्रदायिक सौहार्द की। बिहार में लोक आस्था के महापर्व छठ में यह सौहार्द देखने को मिलता है। छठ जैसे महापर्व में सबसे प्रमुख प्रसाद माना जाता है महावर। लाल रंग का यह गोल महावर हिन्दू नहीं मुसलमान बनाते हैं। जिसका प्रयोग सभी हिन्दू बगैर किसी भेद भाव के करते हैं। पटना प्रक्षेत्र में यह महावर डुमरांव में बनती है।

चिक टोली एवं कुम्हार टोली में मोदी कुरैशी, बासा कुरैशी, फकन कुरैशी, मुश्ताक कुरैशी, ननक कुरैशी ऐसे दो दर्जन परिवार हैं। जो महावर बनाते हैं। छठ जैसे पवित्र पर्व में महावर को बनाना काम बहुत की कठिन है। पहले गर्म पानी में गुलाबी रंग घोला जाता है। फिर रुई के गोले बनाए जाते हैं। उन्हें रंगा जाता है। फिर पापड़ की तरह चौड़ा कर धूप में सूखाया जाता है। तब बनकर तैयार होती है महावर। इसकी बिक्री की दर डेढ़ सौ रुपये सैकड़ा है।

डुमरांव के अमिना खातून बताती है कि हमारा परिवार इसे बनाने का काम लगभग पांच दशकों से करते चले आ रहे हैं। छठ जैसे पवित्र पर्व को ध्यान में रखते हुए हम साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखते हैं। क्योंकि उपर वाला सबके लिए समान होता है। यह धार्मिक निष्ठा है इस छठ महापर्व की। सिर्फ इतना ही नहीं। पहले यूपी बिहार के कई इलाकों में डुमरांव की महावर की आर्डर बुक होते थे। परन्तु पिछले एक दशक में लोकल इलाकों में निर्माण होने से डिमांड में कमी आई है। लेकिन यह पुश्तैनी काम है इसलिए आस्था से हमलोग का पुरा कुनबा आज भी बनाता है।

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