कोरोना का असर / लॉकडाउन के कारण अब बेरंग होने लगी है सिंधोरा बनाने वालों की जिंदगी

Now the lives of the makers of Sindhora are becoming colorless due to the lockdown
X
Now the lives of the makers of Sindhora are becoming colorless due to the lockdown

  • नगर के छठिया पोखरा, शहीद मर्द रोड व गोशाला रोड के साथ ही कई गलियों में सिंधोरा बनता है, पर नहीं आते हैं खरीदार

दैनिक भास्कर

May 30, 2020, 05:00 AM IST

डुमरांव. वैश्विक महामारी कोरोना की उपज लॉकडाउन के कारण डुमरांव की खास पहचान सिंधोरा उद्योग चौपट हो गया है। कारीगर सिंधोरा तो बना रहे हैं लेकिन शादी-ब्याह पर रोक लगने से इसके खरीदार नहीं मिल रहे है। जिससे सिंधोरा बना उसमें चटक रंग भरने वालों की खुद की जिंदगी बेरंग हो गई है। पिछले ढाई महीने के दौरान वे सिंधोरा बनाकर भी भूखमरी के शिकार हो रहे है। जिस कारण सिंधोरा निर्माण के परंपरागत धंधे से जुड़े डुमरांव के खरवार बिरादरी के लोगों में गहरा आक्रोश है।

उनका कहना है कि होली के पहले से ही वे लग्न में डिमांड को देखते हुए बड़े पैमाने पर सिंधोरा का निर्माण कर रहे थे। लेकिन लग्न शुरू होने के ऐन वक्त पर ही लांक डाउन शुरू हो गया तथा शादी ब्याह पर रोक लगा दी गई। जिससे उनका व्यवसाय चैपट हो गया है। बिक्री नहीं होने से सिंधोरा निर्माण से जुड़े करीब डेढ़ सौ परिवारों के समक्ष दो वक्त की रोटी का जुगाड़ मुश्किल हो गया है। हालांकि जैसे तैसे कर वे अब भी सिंधोरा निर्माण करते आ रहे है। 
हस्तनिर्मित सिंधोरा का एकमात्र केन्द्र है डुमरांव
डुमरांव हस्त निर्मित सिंधोरा उद्योग न सिर्फ सूबे बिहार का बल्कि पड़ोसी रज्य उत्तर प्रदेश का भी एकमात्र केन्द्र है। एक जमाने में डुमरांव के खरवार जाति के सैकड़ो परिवार इस उद्योग से जुड़े थे। नगर के छठिया पोखरा, शहीद मर्द रोड व गौशाला रोड के साथ ही कई अन्य गलियों में दिनरात सिंधोरा का निर्माण होता था।

लेकिन बाद में मुगलसराय में मशीन से सिंधोरा का निर्माण होने तथा पुश्तैनी पेशे में अधिक लाभ नहीं मिलने से कई परिवार इस परंपरागत शिल्प को छोड़ दूसरे रोजगार या मजदूरी में लग गए है। आज भी डुमरांव में बने सिंधोरा की मांग बिहार के साथ ही उत्तर प्रदेश, बंगाल, झारखंड आदि राज्यों तक होती है।
आम की लकड़ी व प्राकृतिक रंगों से बनाया जाता है सिंधोरा
सिंधोरा आम की लकड़ी से बनाया जाता है। जबकि इसे प्राकृतिक रंगों व जड़ी कढ़ाई से सजाया जाता है। पहले हस्त संचालित लेथ मशीन से सिंधोरा का गोटा कटाई व डिजायन तैयार किया जाता है। फिर इसमें चपरा, राजन, प्यूडी, केवड़ी, जंक्शन, बूकी आदि प्राकृतिक रंगों से चटक रंग भरा जाता है। इसके बाद जड़ी कढ़ाई व पेंटिंग के द्वारा इसे और आकर्षक बनाया जाता है।

इस काम में उनके परिवार की महिलाए भी हाथ बंटाती है। कई महिलाएं तो जड़ी कढ़ाई व पेंटिंग में इतनी परांगत है कि उनकी पेंटिंग देखने वाले दंग रह जाते है। शहीद मर्द की सोनी देवी, उषा देवी व देवान्ती देवी सरीखी महिलाए बड़ी कुशलता से सिंधोरा की कढ़ाई व पेंटिंग करती है।
सरकारी उदासीनता से है गहरी निराशा
लाक डाउन में सिंधोरा निर्माण ठप होने तथा उनके इस पुश्तैनी धंधे के प्रति सरकारी उदासीनता से खरवार बिरादरी के लोगों में गहरी निराशा है। शहीद मर्द के राजकुमार खरवार ने बताया कि सदियों से उनके बिरादरी के लोग इस व्यवसाय से जुड़े है। लेकिन इस उद्योग के प्रति सरकार की उदासीनता से अब इसे बचाए रखना मुश्किल हो रहा है। उन्होंने कहा कि सिंधोरा निर्माण करने वालों को किसी तरह की सरकारी सहायता नहीं मिलती है।

लाकडाउन के बाद सिंधोरा निर्माण से जुड़े लोगों द्वारा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिख व्यथा बताई गई है। बावजूद सरकार द्वारा कोई सहायता नहीं की गई है। वही सतीश खरवार, अशोक खरवार, अनिल खरवार आदि का कहना है कि यदि सरकार हमारे पुश्तैनी धंधे के संरक्षण तथा सरकारी सहायता नहीं देगी तो अब डुमरांव के हस्त शिल्प की यह खास पहचान मिटने वाली है।

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना