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प्रशिक्षण:कृषि महाविद्यालय के वैज्ञानिकों ने दो बीघे में ट्रायल के रूप संरक्षण विधि से की धान की खेती

डुमरांव11 दिन पहले
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  • सीधी बुआई से खेती करने पर किसानों की बढ़ेगी आमदनी, नहीं होगा पर्यावरण प्रदूषित खेतों की उर्वरा शक्ति में आए नई जान
  • गर्मी और नमी की अधिकता भी फसलों के उत्पादन से जुड़े अन्य गम्भीर मुद्दे

वीर कुंवर सिंह कृषि महाविद्यालय डुमरांव के वैज्ञानिकों के द्वारा किसानों को कम लागत में ज्यादा फायदा वाली धान की खेती का पहली बार प्रयोग किया है। इसके लिए दो बीघा में सीधी बुआई (संरक्षण खेती) का प्रयोग डुमरांव की धरती पर किया है। जिसमें बेहतर फसल भी लगे है। जिसको लेकर वैज्ञानिकों की टीम ने आज खेतों का निरीक्षण किया।

कृषि काॅलेज के प्राचार्य डा. अजय कुमार सिंह सीधी बुआई से बेहतर फसल पैदावार को देखते हुए गदगद है। डाॅ. अजय ने बताया कि भौगोलिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण इस क्षेत्र में संरक्षण खेती के लिए बड़ी अच्छी सम्भावनाएं हैं। यहां कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में किसी भी महत्त्वपूर्ण प्रयास का लक्षित समूह के सामने प्रदर्शन करके इसका किसानों में आसानी से प्रचार-प्रसार किया जा सकता है।

इसके संबंध में दैनिक भास्कर को जानकारी देते है हुए वैज्ञानिक डॉ आनन्द कुमार जैन कहा कि संरक्षण खेती के बारे में बताया कि जिनसे जमीन के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर बुरा असर डाले बिना उत्पादन और उत्पादकता में स्थायित्व लाया जा सकता है।

डा. जैन ने बताया कि जलवायु परिवर्तन, मिट्टी के उपजाऊपन में गिरावट फसलों की उपज में कमी या ठहराव आने ,जमीन के खराब होने और पर्यावरण प्रदूषण जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए कंजर्वेशन एग्रीकल्चर यानी संरक्षण खेती को एक महत्त्वपूर्ण रणनीति माना गया है।
आठ फीसदी इलाके में हुआ है संरक्षण खेती का प्रसार
डा. आनंद कुमार जैन ने बताया कि फिलहाल दुनिया के फसल पैदा करने वाले करीब 8 प्रतिशत इलाके में संरक्षण का प्रसार हो चुका है। पिछले डेढ़ दशक में भारत में भी इसकी कुछ शुरुआत हुई है। सिंधु-गंगा मैदान अपनी उपजाऊ जमीन और पानी की पर्याप्त उपलब्धता (भूमिगत जल और नदियों से निकाली गई नहरों के पानी) की वजह से भारत का खाद्यान्न भंडार रहा है। इस क्षेत्र में ज्यादातर धान और गेंहूू की खेती पर आधारित कृषि प्रणाली प्रचलित है।

खेतों में अवशिष्ट जलाने से उत्पन्न होती है गम्भीर समस्या
डा. जैन ने बताया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के धान-गन्ना व गेहूं की खेती करने वाले क्षेत्र से घिरा है। इन इलाकों में डेयरी-लद्दू मवेशियों की तादाद कम होने से धान और गेहूं की फसल के अवशिष्ट पदार्थ बड़े पैमाने पर बेकार चले जाते हैं और इनका निपटान करना एक बड़ी समस्या है।

इसलिए किसान अपने खेतों को तैयार करने के लिए इन अवशिष्ट पदार्थों को खेत में ही जला देते हैं ताकि खेतों को अगली फसल के लिए जल्द तैयार किया जा सके। लेकिन फसलों के अवशिष्ट से वायुमंडलीय प्रदूषण की बड़ी गम्भीर समस्या उत्पन्न होती है, खासतौर पर नवम्बर-दिसम्बर के महीनों में जब धान की पराली बड़े पैमाने पर जला दी जाती है। गर्मी और नमी की अधिकता भी फसलों के उत्पादन से जुड़े अन्य गम्भीर मुद्दे हैं।
मिट्टी के साथ न्यूनतम छेड़छाड़ व अदला-बदली करके से बोए फसल
कृषी वैज्ञानिक ने बताया कि संरक्षण की इस अनूठी विधि के दायरे में मिट्टी के साथ न्यूनतम छेड़छाड़, फसलों के अवशिष्ट पदार्थों या फसलों के जरिए जमीन पर वनस्पतियों का आवरण तैयार करना तथा उत्पादकता बढ़ाने के लक्ष्य को प्राप्त करना और पर्यावरण सम्बन्धी प्रतिकूल प्रभाव को कम करने के लिए अदला-बदली करके फसलें बोना भी शामिल हैं।

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